Friday, September 2, 2011

तन्हाई

मित्रों,

आज दिन में नींद उचट गयी थी। फिर आने का नाम ही ले रही थी। एेसे में एक कविता या गजल (क्या है ये तो मैं नहीं जानता बस जो मन में आया वही उकेर दिया पन्नों पर) सूझ गयी और उसे सुबह सात बजे ही लिख दिया। अब हम क्या बतायें कविता नहीं लिखा मेरे लिए आफत हो गयी। उसे सुनाने के लिए सुबह से 16 जगह फोन कर चुका लेकिन कोई सुनने को तैयार ही नहीं। सच बताऊं एक हमारे गुरु हैं श्री मुनेश्वर मिश्र जी (इलाहाबाद में अमृत प्रभात के सम्पादक हैं।) उन्हें चार बार फोन किया। सारी बातें तो कर लेते लेकिन जब गजल की बारी आती तो कहते कि अभी थोड़ी देर बाद। एक हमारे बड़े भाई हैं, वह भी एक अच्छे अखबार में सम्पादक हैं। उनकी क्या कहें। जब तक कलम का सौदा नहीं था तब तक तो ठीक था लेकिन जैसे उनके यहां अपनी कलम बेंचकर हमें पाप का बोध होने लगा। अब तो उनसे बात करने में भी डर लगता है। एेसे में उन्हें कविता कैसे सुना सकता, जबकि पहले तमाम लिक से हटकर बातें होती रहती थीं। एक मित्र है संतोष, उसे सुनाने का आतुर हुआ तो वह कहा जब लखनऊ आऊंगा तभी तुम्हारी सिर्फ एक कविता सुन सकता हूं। अब बताइये तब सैकड़ों हो जाएगी। एेसे में एक सुनाकर कैसे जी भरेगा। एक चंद्रभूषण तिवारी हमारा मित्र किसी तरह वह सुना लेकिन पहले ही सौदा कर लिया कि लखनऊ आने पर कविता के बदले थम्सअप पिऊंगा। सो अब सुन लिया है लेकिन उसे थम्सअप पिलाने की भी चिंता सता रही है (यदि कविता के बदले पिलाने की बात है तो यह एक हर्जाना की तरह लगता है। एेसे तो हमेशा चले कोई बात नहीं।)

अब ऐसे में क्या करता हमारे पास फेसबुक ही चारा बचा था। सोचा कम से कम कुछ लोग तो खाली बैठे ही होंगे जो इसे पढ़ लें और हमारे दिल को तसल्ली मिल जाय। इसलिए सुपुर्द कर रहा हूँ आपके हवाले। थोड़ा धैर्य से पढिय़ेगा और हमारी तंहाई पर गौर फरमाइयेगा।

तन्हाई

हम तन्हाइयों में यूं ही रोया करते हैं,

रात में जगते, दिन में सोया करते हैं।

वो कहीं और, मैं कहीं और,

बातों-बातों में यूं ही रोया करते हैं।

क्या करें यार, वक्त का तकाजा है यही,

लेकर दुनिया का बोझ अपने सिर ढोया करते हैं।

करते हैं तदबीर बहुत, तनदिही भी कम नहीं,

पर आँसुओं से हम अपने गम को धोया करते हैं।

सुख जाते हैं आँसू, सोचते हैं तकदीर है यही अपनी,

यही सोचकर दिन-रात रोया करते हैं।

दिल पर रख पत्थर, छोड़ आये गाँव,

यहां अर्थ के लिए जगते और अर्थ पर ही सोया करते हैं।

धैर्य के लिए धन्यवाद..