बसंत में बूढ़ी भी जवां हो जाती है,
बंझे में भी कुछ फली आ जाती है।
हाथ में हाथ होने पर तो ठीक है,
पर अभागन के लिए रात कटिली हो जाती है।
कुछ इसी तरह का मौसम बन रहा है। बसंत तो एेसा मौसम ही है कि धरा के हर जीव जगत को हरा-भरा कर देता है। इस इठलाते गुदराते हुए मौसम में कुछ फसलों के गोंद में अंकुर आ चुके हैं तो कुछ पर आने का इंतजार है। किसान इन लहलहाती फसलों को देखकर तमाम सपने पिरो रहे हैं। अब पता नहीं, ये सपने पूरे भी होंगे कि प्रकृति की गोंद में ही दफन हो जाएंगे। दलहन के खेतों को सरसों के फूल पीतांबर आेढा रखे हैं। फली होने तक पता नहीं ये किसान के घर में जाएगा अथवा खेत में ही लाही का षिकार हो जाएगा। लेकिन अभी तो सबका दिल मोह ले रहे हैं। आखिर शैशवावस्था तो सबके लिए प्रिय होती ही है, चाहे वह पशु में सूअर का बच्चा ही क्यों न हो। एेसे में रसिक मिजाजी भंवरे इस अवसर को कहां छोडऩे वाले। वे चारो तरफ खेतों में घूम-घूमकर रस लेने और अठखेलियां करने से नहीं चूकते। तितलियां तो इन फूलों को छोड़ती ही नहीं। लेकिन उनके लिए सौतन बन गया है हवा का झोका, बार-बार बैठती हैं लेकिन यह झोका उन्हें पूर्ण रसास्वादन से वंचित कर देता है। इन झोंकों के सहारे तितलियों को हटाना एेसा लगता है कि इच्छा तो फूलों को भी तितलियों व भंवरों से सटे रहने की है ( क्योंकि इस रस का लेन-देन चित्त को प्रफुल्लित तो करता ही है।) लेकिन लोक-लाज के कारण उनसे मुंह छिपाकर इठला रहे हों। जिन पौधों में फली लग गयी है वे नन्हें बच्चे को गोंद में हिलोरे देकर सुला रही हैं। उनके पास न ही तितलियां आती है और न तो भंवरे। आखिर रसहीन गलियों में कोई रस तो लेने जाएगा नहीं। हां वहां कोई जाता है तो प्यार नहीं पेट की भूख मिटाने के लिए कीड़े। जो फसलों के गोंद को ही सूना कर देने पर तूले हुए है। फसलें अपने सामथ्र्य भर उन्हें हटाने का प्रयास तो करती हैं लेकिन उनका प्रयास असफल ही है। उनका दर्द चकला घर की वेश्याआें की तरह हो गया है जो सामाजिक पीड़ा के बावजूद हर वक्त मुस्कराने के लिए ही मजबूर होती हैं। फसलों को अब तो बस आसरा है इन बेदर्दी कीड़ों से बचे बच्चों को अपने गोंद में पालने का। आम में बऊर आ चुके हैं। उन पर भी कभी भवरें तो कभी तितलियां पहुंचने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। लेकिन लाही का इतना प्रकोप है कि बऊर तो क्या पत्तियां भी एेसे चिपचिपा रही हैं मानो उनको पसीने ने सराबोर कर दिया हो। कभी-कभी तो तितलियों के पंख पत्तियों में सटकर वहीं रह जाते हैं और वे हमेषा के लिए उड़ान न भरने के लिए मजबूर हो जाती हैं। यह लीला उसी तरह है जैसे दीपक पर कीड़े मरते रहने के बावजूद जाना नहीं छोड़ते।
यह ऋतु तो अभी शैशवावस्था में है लेकिन हर व्यक्ति के मन में बयार अभी से जवां हो चुकी है। अनाज कोठरी में आए अथवा नहीं किसान को भी इसकी चिंता कम बसंत के बसंत की चिंता ज्यादा है। क्योंकि उनके लिए तो बमुश्किल इस दिन का ही बसंती बयार है, फिर तो उन्हें जुटना होगा फसल की कटाई व मड़ाई में। और षरीर की थकान के बाद तो इश्कमिजाजी लोगों को भी कामदेव पर थकान भारी पड़ जाता है, सिर्फ कभी-कभी लोग भूख भर मिटा लेते हैं। वैसे इस वैज्ञानिक युग में तो बेमौसम ही लोग मौसम बना लेते हैं, बिना उम्र भी लोग जवां हो जाते हैं। हम तो पाश्चात्य की बुराई को ही लेने में मस्त हैं। उनकी अच्छाई तो कभी लिया नहीं, न ही लेने की संभावना है। इसी कारण आजकल तो चलन ही हो गया है कि कोई अपनी संस्कृति से हटकर काम करना है तो उसे मार्डन अथवा पाष्चात्य संस्कृति से जोड़ दो सब चल जाएगा। एेसा न होने पर सीनेमा युग कैसे आएगा। इसके लिए तो यह जरुरी ही है। आखिर बुद्घि का सदा दुरुपयोग करने वाला जगत का सर्वाधिक अंहकारी जीव भला मानव वक्त मिलने पर उसे कहां छोडऩे वाला। हमें तो जितनी अधिक बुद्घि मिलती है उतना अधिक उसका दुरुपयोग करने में लग जाते हैं। इसी मानव जगत को ही तो देखकर कुत्ते जैसे वफादार पशु भी आजकल मौसम के बंधन से मुक्त हो गये हैं। जहां हुआ जब हुआ मालिक की रखवारी छोड़ किसी चौराहे पर प्यार का इजहार करने जुट जाते हैं। आजकल सांड भैंसो से भी परहेज नहीं करते। इस वैज्ञानिक युग में मानव के लिए तो सबकुछ पैसा है। आज पैसे से जवानी भी खरीद ली जाती है। इसी कारण तो बड़े-बुढ़े भी किशोरावस्था में प्रवेष करने वाली युवतियों को भी सम्मोहित करने का कोई अवसर नहीं गंवाना चाहते। कुछ बची-खुची लोक-लाज अथवा पटाने में असमर्थ होने पर रोड न सही होटल में ही पैसे के बल पर ही बुलाकर पूरी रात प्यार का इजहार कर लेते हैं। होटलों में हर जगह इसकी व्यवस्था है ही, इसके बिना भला कौन होटल चल पाएगा। बूढ़े तो वे होते हैं जिनके पास पैसे नहीं हैं। उन गरीब भट्ठे आदि पर काम करने वाले बेचारों की तो जवानी क्या लरिकाई भी बुढ़ापे में तब्दील हो जाती है। एेसे में यदि प्रकृति साथ देने को उतारु हो जाए तो दो जून की रोटी की व्यवस्था करने में सक्षम भला कौन उसका लाभ लेने से वंचित रहना चाहेगा। इस मौसम में तो बिना हाड़-मांस वाले गलफड़े धंस चुके, नीचे से ध्वस्त हो चुके लोगों को भी बरबस जवानी याद आने लगती है। पशु, पक्षी हों या पेड़-पौधे सबको इस मौसम का इंतजार होता है, फिर एेसे में इन सबमें श्रेष्ठ माना जाने वाला प्राणी मानव जगत भला इससे कैसे अछूता रह सकता है।
किसी को दिन के वक्त इजहार करने को न मिले तो एक बार चल जाता है लेकिन रात तो सोने और अपनी किस्मत पर रोने या हंसने के लिए बनाई गयी है। आखिर रात्रि के प्रहर में तो चिडिय़ा भी अपने घोसले में ही रहना चाहती है। फिर भला मनुष्य को यदि अपने जोड़े के बिना रात काटनी पड़े तो कांटा से भी वह रात कटिली होना स्वभाविक है। इसी कारण तो आज अपनी जीवन साथी को छोडक़र बाहर रहने वाले दिल घर में परंतु शरीर किसी और को देने के लिए उतारु हो जाते हैं। यहां तक कि गांव भी अब षहरी जीवन से बहुत दूर नहीं है। इसका अंदाजा तो गांवों में अपनी पकड़ बना चुका एड्स से ही लगाया जा सकता है। अभी 2008 में ही इलाहाबाद में यमुनापार के एक गांव में दो बच्चों की मां ने अपने प्रेमी के लिए पति का टुकड़ा-टुकड़ा करके सुबूत मिटाने के लिए चुल्हे में जला दिया था। अब षारीरिक हवस मिटाने के लिए इस तरह की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं आम हो गयी हैं। यदि बसंत में अपनी बसंती न मिले तो घर में कैसे रहा जा सकता है। इस समय रात बहुत ज्यादा सुहानी होने के कारण यदि प्रेयसी के साथ सोने को न मिले तो रात में सोख्ते का गद्दा भी बेर के कांटे की तरह बैरी बन जाता है। एेसे में यदि रात चांदनी हो तो क्या कहना। उसमें भी यदि एकांत रहे तो तडफ़ड़ाना वर्णन से परे हो जाता है। यदि उम्र अभी कली से से फूल की तरफ बढऩे को अग्रसर हो और विभिन्न तरह के वातावरण से जूझ रहा हो तो निष्चय ही उसके दिल में ज्वार फूट उठेगा।
इसी तरह की पूर्णमासी की रात है। बादल का एक गुटका भी आकाष में दिखाई नहीं देता। चांद पूर्णतया प्रौढ़ावस्था में है और सूर्य की अनुपस्थिति में आकाष का राजा बना हुआ है। एेसा लगता है कि ठंडे दिमाग वाला चांद भी आज लोगों को तो शीतलता पहुंचा रहा है लेकिन सूर्य की रोटी पर पलते हुए भी वह उसी से दो-दो हाथ करने के मूड में आ गया है। आखिर अपनी जवानी पर गर्व और उसका दुरुपयोग करने का मौका मिले तो कौन चूकता है। चांद भी तो भले देव श्रेणी में है लेकिन इसी समाज की रोज मधुर बेला की गतिविधियां देख रहा है। जहां किसी स्त्री को देखकर नौकर को भी मालिक की भूमिका में आते देर नहीं लगती। आज तो जो जिसकी रोटी पर पलता है आगे बढ़ जाने पर उसी का गला काटने पर उतारु है। एेसे में यदि इस समाज की गतिविधियों को रोज देखने वाला चांद एक दिन थोड़ी देर के लिए लडऩे के मूड में आ ही गया है तो क्या बुरा कर रहा है।
उसकी रोषनी से घासों पर पड़ी आेस की बूंदें मोती से भी ज्यादा चमक रही हैं। ऐसा लग रहा है कि स्वर्ग का सारा आनंद आज धरा पर उतर आया है। आकाष में चांद के साथ-साथ तारे भी आकाश में टिमटिमा रहे हैं। इन बेचारों का तो हाल पुलिस की तरह हो गया है। जब सबका समय सोने का होता है तो इनकी ड्यूटी लगा दी जाती है। जब क्या करें फंस गये हैं ये लोग भी। थोड़ी सी गनीमत है कि इनका पूरा कुनबा ही आ गया है। पुलिस की तरह सेक्सुअल कुण्ठा का शिकार न बन जाएं इसलिए ये लोग लोक-लाज छोड़ बज्र बेहाया बनकर अमेरिकन सिस्टम अपना रहे हैं। खुले आसमान में ही बिना थके हुए अपनी प्रेमिका को पकडऩे के लिए हिरन की रफ्तार से दौड़ रहे हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि हिरनों ने इनसे ही प्रणय बनाना सीखा था।
इनका भी प्रयास करना लाजिमी ही है, क्योंकि ये भी तो उसी प्रकृति के एक अंग हैं और इस धरा पर कोई जीव इससे अछूता तो है नहीं। इसके बिना तो जिंद्गी ही अधूरी है। जब इससे ऋशि गण अछूते नहीं रह पाए तो फिर इन तारों की क्या विसात? जब बेचारों को घर में रहकर रात बिताने के लिए किस्मत में बदा ही नहीं है तो पशुआें की तरह बेहया बनने में ही कल्याण समझना होगा। उधर जब तक सूरज था इन लोगों को कहीं फटकने ही नहीं दिया। ये लोग भयभीत होकर दुबक कर छिपे हुए थे, क्योंकि उससे जीत पाने की उम्मीद तो येा धरा के जन्म होते ही छोड़ दिए थे। अब ड्यूटी के समय ही सही कुछ पल मिला है बादषाहियत दिखाने का उसे ये गवांना नहीं चाहते। इसी कारण इस समय चांद आसमान का बादषाह बनकर बैठ गया है और तारा गण की तरह भाग-दौड़ मचाते हुए मस्ती मना रहे हैं।
यह रात जितनी सुहानी है उतनी ही अभी फूल से कली की आेर अग्रसर सूरज के लिए कटीली है। इसी सुहानी रात में किताबें उसकी सौतन बनकर आ गयी हैं। वह भी तो चाहता है इनसे पीछा छुड़ाना लेकिन क्या करे मजबूरी है उसकी। इससे पीछा छुड़ाने का मतलब है जिंद्गी से पीछा छुड़ा लेना। क्योंकि डिसिप्लिन के मामले में कडक़ पिता जी उसका रहना दुष्वार कर देंगे। उनको चिंता इस बात की नहीं कि बेटवा ठीक-ठाक नौकरी पा जाए, बल्कि चिंता इसकी है कि षादी से पहले ही जो करना है वह कर ले ताकि षादी में अब तक खर्च किए गये पैसे को ब्याज सहित निकाला जा सके। अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाला लेकिन इस मामले में अपूर्ण, प्यार को न समझते हुए भी लड़कियों देखते ही दिल से चोटहिल हो जाने वाला, किसी एक पर न्यौछावर न होकर भंवरों की तरह अनेक फूलों पर भ्रमण करने वाला बेचारा सूरज गांव से लगभग सौ मीटर दूर ट्यूबेल पर कूर्सी-मेज लगाकर पढऩे बैठा है। उसकी परीक्षा अब सिर पर है, जिससे दिखावा ही सही लेकिन पढऩे बैठना उसकी मजबूरी है। क्योंकि उसके बगल में ही पिता जी की चारपाई है। वे आराम से खर्राटे भर रहे हैं। लेकिन सूरज्््! वह तो त्रिया भंवर में फंसे होने के कारण किताब आगे रहते हुए भी उससे कहीं इतर खोया हुआ है। बार-बार अपने को किताबों की तरफ मोडऩा चाहता है। लेकिन फिर कहीं खो जाता है। किताबों की तरफ ध्यान न जाने से वह बीच-बीच में घबड़ा भी जाता है। क्योंकि परीक्षा नजदीक है जिसमें फेल होने का भय सता रहा है। फिर भी क्या करे इस चांदनी रात में जो एक सामने झुरमुट मंद-मंद हवा के हिलोरों के साथ एक मद-मस्त लडक़ी की तरह एेसे हिल रहा है मानों उसे दावत दे रहा है कि मुझे चुम कर तो देखो। एक बार तो वह उसके पास जाकर देख भी आया है कि वह लडक़ी नहीं झुरमुट है लेकिन दिल नहीं मानता। फिर भी उधर से अपना ध्यान नहीं हटा पा रहा है। आखिर इसको कैसे हटा सकता है। दिल तो हमेषा भावनाआें में ही बहता है वह कभी हेतु पर तो विचार करता नहीं।
उसके मन में ज्वार फूट उठता है। आंखों से मोतियों के बूंद टपक पड़ती है। वह मन ही मन भगवान को कोसने लगता है और कहता है कि-
एक ही धरा पर तूने क्यों बनाया
दो तरह का इंसान।
कोई प्यार के लिए मरता जाए,
कोई इसे बना लिया अपनी शान।
इतनी बेमानी ठीक नहीं,
अरे हम भी तो तेरे बनाए हुए ही
हैं इंसान।
वह सिहर उठता है और मन ही मन कहता है कि हे देव जिस रात में हर कोई मुंह को ढककर अपनी प्रयेसी के साथ मस्त हो रहा हो वह रात मेरे लिए इतनी कश्टकारी हो गयी है। ये पुस्तकें आज हमारे गले की फांस बन गयी हैं। आखिर तुम्हारे भी अन्याय की कोई सीमा है अथवा नहीं। जब तुम्हें यही करना था तो फिर इतना बड़ा ही क्यों किया। दूध-मुंहा बच्चा ही बने रहने देता। कम से कम इन किताबों से मुक्ति मिलती। जब इस उम्र में उम्र का वास्तविक लाभ न मिले तो फिर एेसी जिंद्गी से क्या लाभ? फिर पुछता है-क्या फिर वह जमाना लौट नहीं सकता जब दस वर्श में ही षादी हो जाती थी। वह भी कितना अच्छा लगता होगा। आेह! भगवान ने इसका कोई हल नहीं निकाला। कल तक तो हम कम से कम विद्यालय के राह में ही वो चांद जैसा मुखड़ा, हिरनी जैसी चाल, मृगनैन देखा करते थे और आंखों में भरकर कुछ जिंदा रह लेते थे। लेकिन कल तो वे सभी जुदा हो जाएंगी हमसे। इंटर में तो हमारे और लड़कियों की कक्षाएं भी अलग-अलग चलती हैं। इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि औरतों की आवाज सुनाई पड़ती है। वह चौंक पड़ता है। अरे! सवेरा हो गया और सो जाता है।
इस बीच उसकी सहपाठी रम्भा आ जाती है। उसके आते ही सूरजके पैरों तले जमीन खिसक गयी। यह तो स्वाभाविक ही था, क्योंकि जिसके बारे में सोचने मात्र से नीचे के रोंगटे खड़े हो जाते थे यदि वास्तव में आज वह सामने खड़ी हो और वह भी एकांत तथा इस बसंत श्रृतु में तो निष्चय ही स्वर्ग सी छटा बिखेर देगी। यह पल उसके लिए वैसे ही था जैसे किसी ग्रामिण व्यक्ति को फाईव स्टार होटल का सूख मिल जाए। आखिर जिस चांद के टुकड़े को देखकर लोग कल्पनाआें में खो जाते हैं वह धब्बा रहित चांद आज खुद दीदार करने चला आया हो यह तो कल्पनाआें से परे था ही। अब तक तो वह उसके लिए उसी तरह उल्टे पांव रहता था जैसे पपीहा स्वाती नक्षत्र का एक बूंद पानी कंठ तले लेने के लिए पेड़ पर उल्टे पांव हमेषा लटकी रहती है। वह सोच नहीं पाता कि बात कैसे, क्या और कहां से षुरु करुं। किस सीमा तक रहना उपयुक्त होगा।
कुछ साहस करते हुए बोला रम्भा तुम! तुम कैसे इस अंधेरे दिल और उजाली रात में दिल में उजाला भरने आ गयी। मैं अभी भी नहीं समझ पा रहा हूं कि मैं सपने में हूं कि हकीकत देख रहा हूं। कालेज में तो तुम्हारे दीदार के लिए सभी तड़प् जाते थे। तुम्हारे एक दिन के दर्शन से आंखे हतों तर रहती थी और आज तुम यहां।
इतनी आवाज मुंह से निकली नहीं कि पूरा शरीर स्थूल हो गया। बालू के रेत की तरह एेसा लगने लगा कि ठोस होते हुए भी हवा का झोंका कहीं भी उड़ा ले जा सकता है। दिल 120 की रतार से भगने लगा मानों आेवर लोड बर्दास्त करने की क्षमता ही उसमें न रह गयी हो और बैठने के कगार पर आ गया। आखिर वह बैठे भी क्यों न इस तरह का अंहड़ आने पर तो बड़े-बड़े मैदान के मजे हुए खिलाडिय़ों के भी पसीने छूटने लगते हैं। उसमें भी जहां बगल में ही पिता जी की चारपाई लगी हो। वहां तो एक पल में ही सारी खुषी गम में भी बदलने का भय सता रहा था। सूरज तो अभी तक इन मामलों में पूर्ण भी नहीं हो पाया है। जो कालेज के राह में बात करने में अक्षम था वह भला पूर्णता की प्राप्ति पर कैसे सक्षम हो सकता था। वह इस चांदनी रात में चांद की गरिमा को ठेस भी नहीं पहुंचा सकता था, क्योंकि इस तरह की रात न तो कभी उसके जिंद्गी में आयी थी न ही भविश्य में आने की संभावना उसे दिख रही थी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बारे में सोचना उसके बस की बात नहीं रह गयी थी। रहे भी कैसे? क्या कभी फूलों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि स्वयं डाली से अलग होकर घ्राणेन्द्रियों को प्रफूल्लित कर देगें। लेकिन यहां तो वास्तव में कोई देषी गुलाब का फूल सिरहाने बैठकर पंखुडिय़ां फैलाए हुए नाकों तले खुषबू बिखेर रहा है। इसमें दिल की रतार अभी तक बंद नहीं हुई यही क्या कम है?
लड़कियां दिल की बात पढऩे में तो तेज होती हैं, सो रम्भा इन गतितिधियों से अनभिज्ञ कैसे रह सकती थी। सूरज का तेज कहीं आकाश से हमेशा के लिए गायब न हो जाए इस बात का एहसास करते हुए हंसती हुई झट से बोली :- प्यार का इजहार मंच पर नहीं होता। वहां तो सिर्फ सूटिंग होती है। यह अकेले में लेने-देने के लिए बनाया गया है। हमें नाटक तो करके पूरे समाज को दिखाना नहीं है। कुछ लोक-लाज भी तो है। सबके सामने वहां बोलना कैसे संभव था। फिर भी मैं जहां तक हो सके सबके बीच गंध कह लो या दुर्गंध उसे तुम्हारे नाकों तक पहुंचाने की कोशिश करती ही थी। नारी जाति को तो भगवान ने इतना साहस अभी तक नहीं दिया िकवह खुलकर किसी से अपने प्यार का इजहार कर सके। जितना तक संभव था मैंने पूरा जाल फेंक दिया। सोचती थी कभी न कभी तुम्हारी नाक तक मेरी गंध पहुंच ही जाएगी और उस प्यार के गंध को समझने में तुम सफल होगे। फिर हमारा मिलन संभव हो जाएगा। इसी सपने को संजोते हुए एक साल हमने$.$.$.$.$.$(लंबी सांस खीचते हुए) गुजार दिया। लेकिन तुम तो ठहरे निर्मोही। पता नहीं किस मिट्टी से भगवन ने तुम्हें बना दिया। कुछ दिन देखते-देखते सर्द हवाएं भी शरीर जलाने लगी फिर धीरे-धीरे बंसत बढऩे लगा तो हमारी सहन षक्ति जबाब दे गयी और आज ही मंदिर जाकर प्रथम प्रतिक्रिया स्वयं कर देने की भगवान से साहस मांगी और दिनभर उधेड़बून में रहने के बाद आज रात्रि को ही अपना बना लेने की कसम खा डाली और इजहार करने प्यार का अपना प्यास ले चली आयी तेरे पास। हमें उम्मीद है इस ललक में तू खलल ना डालकर प्यास को बूझा दोगे।
उसकी आवाज सुनकर सूरज को कुछ ढाढस बंधा और पिता की चारपाई की याद भूल सी गयी। वह थोड़ा रईस बनते हुए बोला :- तुम जानती तो हो हमें भी कुछ शर्म सी आती रहती है। तुम्हारे भोलेपन को तो मैं भी कनखियों से निहारता रहता था लेकिन क्या करें भगवान ने उतना साहस ही नहीं दिया जो मुख से इसका इजहार कर सकें। तुम समझती हो हो यह कलम व्यक्ति को हिजड़ा बना देती है। हर बात मुंह से निकालने से पहले यश-अपयश की तरफ दिमाग दौडऩे लगता है और वह इतना दौड़ता है कि तब तक इजहार का समय ही बीत चुका होता है। मैं तुम्हारी मुस्कान को देखकर म नही मन गद्गद हो उठता था। कभी-कभी साहस भी जुटाता था बोलने का लेकिन बोलने से पहले ही वो टूटकर बिखर जाता था। क्योंकि लड़कियों को पढऩे का अभी तक हमने किताब नहीं पढ़ा है। क्या बताऊं तुझे, कभी-कभी तो जाड़े के दिन में भी पसीने आ जाते थे। ज्यादा सोचने का कारण था कि भाई आजकल तो सभी लड़कियों की बात ही सही मानते हैं। यदि तुम शिकायत कर दी तो कोई भी तुम्हारी दिल छूने वाली उस हंसी पर तो गौर करेगा नहीं। वह तो सीधे दस जूता सजा देगा मेरे गालों पर और लेकर चला जाएगा पिता जी के पास जहां कितनी सजा मिलेगी यह मेरे कल्पना से परे है। इसके साथ ही हमेषा के लिए समाज में खूद ही गिर जाना पड़ेगा जो शायद इस जन्म में उठना मुश्किल होगा। यदि तुम्हें अवसर का इंतजार था तो हमें इशारे से ही कहीं अन्यत्र बुला लेती। यदि एक बार एेसा हो जाता तो फिर इस हंसी को बराबर मैं दिलों से निकलने नहीं देता और फिर कैद कर लेता हमेषा के लिए खूद रोज चला आता तेरी गलियों में जहां हम दोनो एक दूजे के हो सकें। मैं भी तो सदा तड़पता ही रहता था। लेकिन पहली बार (रोंगटे खड़े हो जाते हैं उसके).$.$.$.$.$। भला बताआे ये कैसी विडंबना है कि पौधा पानी बिना सूख रहा है और पानी बेकार में बह रहा है लेकिन उसके राह में कोई पौधा नहीं मिल रहा है। इस अंत पानी को बहते पूरे दो साल हो गये लेकिन पौधा तो तडफ़ड़ा ही गया। पानी का भी सदुपयोग नहीं हो पाया। धन्य हो समाज की बेडिय़ां। जिसने हमें इतना बांध के रखा है कि हम प्यार की आग पर दो बूंद पानी भी ना डाल सकें। रम्भा जो आग बुझाने के बजाय उसमें घी डालता हो, क्या उसका औचित्य में बने रहना उपयुक्त है।
रम्भा :- यह सच है कि समाज के कारण हम इतने दिनों से मिल नहीं पाए, लेकिन इस कच्ची उम्र में हम इन बेडिय़ों को तोड़ भी तो नहीं सकते। उसे तोडऩे का मतलब है अपने निवाले को ही खत्म कर देना। इसे खत्म करके हम जिंदा नहीं रह सकते। इतना भी हममें दम नहीं कि कहीं भट्ठे पर काम करके ही कुछ दाम निकाल लें और दूसरी नौकरियां मिलेगी नहीं। सुनी हूं फैक्ट्रियों में तो आजकल गेट से ही भगा देते हैं। जब तक हम उसी समाज के आसरे पर जिंदा हैं तब तक उसके नियमों को तोडऩा निवाले को खत्म करने के समान है। परीक्षा भी नजदीक है समाज क्या दीवार को भी इन गतिविधियों की भनक लग जाए तो जीना दुश्वार हो जाएगा। रिजल्ट कुछ अशोभनीय आया तो पूरे क्षेत्र के लोग तील का ताड़ बना देगें। नरक भी हमारी जिंद्गी से शर्माने लगेगा।
सूरज :- यह तो ठीक है लेकिन क्या तुम्हारा मन किताबों में बैठता है। यह कहीं इससे इतर नहीं भटकता। परीक्षा की तैयारी ठीक ढंग से हो पा रही है?
रम्भा :- यदि वही हो जाती तो फिर तेरे पास आने की शायद जरुरत न होती। उसी का तो सूत्र जानने और दिल में बरस रही आग पर पानी छिडक़ने इस रात में बात करने चली आयी। मन चचंलता तो इस समय और बढ़ गयी है किताब खोलते ही यह पता नहीं कहां से कहां तक पहुंच जाता है। इतनी स्पीड तो हवा में भी नहीं होगी जो इसमें है। दस मिनट रुका नहीं कि हवा का झोंका शुरु। एेसे में बेड़ा पार होना मुश्किल दिख रहा है। अब बहुत कोशिश करने पर तो एकाध प्रश्न याद हो पाते हैं जो आजकल ऊंट के मुंह में जीरा है। इस तरह से नईया कैसे पार होगी, समझ में नहीं आता।
सूरज :- कम से कम एक प्रश्न रोज याद कर लेती हो तो तुम्हारा तो बहुत ही ठीक कहा जाएगा। यहां तो एक प्रश्न दूर पहले से संचित किया हुआ भी बहे जा रहा है। किताब लेकर बैठने पर नींद तो उड़ जाती है लेकिन दिमाग भी किताबों से इतर ही उडऩे लगता है। किताबों में बैठाने की कोशिश भी नाकाम रहती है। खैर छोड़ो यह समय किताबी परीक्षा का नहीं दिल की आग पर पानी डालने का है। थोड़ा समय मिला है उसमें भी किताबी बात करने से कोई फायदा नहीं। दिल शांत रहेगा तो दिमाग किताबों में बैठेगा ही।
रम्भा :- (कुछ गंभीर हंसी हंसते हुए) अच्छा बताआे यह अंत:करण की तितली कहां-कहां उड़ती रहती है। कभी-कभी तो इसे शांत किसी एक के चित्त में बैठने के लिए कहो। कभी तितली का राह मेरे गलियारे से भी होकर गुजरता है कि नहीं।
सूरज :- देखो रम्भा मैं किसी के मुंह पर तो उसकी बड़ाई अथवा उससे कितना प्यार करता हूं यह जताना नहीं जानता। यदि एेसा जानकार ही रहता तो फिर दूसरों की भांति मैं भी अब तक बहुत ही सैर-सपाटा कर आता। लेकिन यदि तुम दिल का दर्द छेड़ ही दी हो तो सच बताता हूं कि यह चित्त तो दिन-रात तेरे ही गलियारे में भ्रमण करने के कारण किताबों में नहीं बैठ पाता। आखिर तुम्हें देखने के बाद कुछ बचता भी तो नहीं जिसकी तरफ चित्त को फेरा जाए। पूरे विद्यालय में दिल से हो या शरीर से कोई एेसी लडक़ी ही नहीं जिसके गलियारे मन घूम कर कुछ शांति पा ले। ये तो मैं ही नहीं खुद बनाने वाला भी सोचता होगा कि काष एेसी गढ़ाई फिर उसके हाथ से हो जाती। नजरें इनायत की तो बात ही छोड़ो बड़े-बड़े खिलाड़ी तुम्हे देख लेने मात्र से ही अपनी किस्मत का अहो-भाग्य मानते हैं। तुम्हारे आगे इस जिले में कोई रहा ही कहां जहां किसी की नजरें जा सकें।
रम्भा :- (मन ही मन गद्गद हो उठती है। आखिर हो भी क्यों न यहां तो अंगुठाछाप सफेद पोषाक के गदहे भी अपने चारण के लिए ही बहुतेरों को रखे होते हैं। गद्दी पाने के बाद हर अवगुणों में माहिर खद्दधारियों को भी भगवान बनाकर चालिसा लिख दिया जाता है और मजे की बात तो यह कि उसी भगवान से उसका विमोचन करा कर चारणकर्ता करोड़ों का वारा-न्यौरा भी करना बखुबी जानता है। फिर भाई त्रिया गुण तो बहुत पहले से ही चारण सुनने के लिए जाना जाता है। आखिर शादी के बाद पति द्वारा तो उसके बारे में चारण सुनाया नहीं जाएगा। वह तो कुछ दिन के बाद ही उसकी कमियों को उजागर करने के लिए बैठा रहता है। फिर एेसे में बेचारी युवतियां ऐसे कभी मिले हमराही से ही तो चारण सुनने की इच्छा रखती है। इसी कारण तो राह में अकेले राही को देखकर भी अधिकांश अपने शरीर को इठलाने लगती हैं, ताकि जाते-जाते कुछ सौंदर्य पर फब्तियां कस जाए। इससे उनके दिल को तसल्ली होती है और तुरत होठों पर मुस्कान आ जाता है। इसी का तो फायदा उठाकर बाजारु प्रेमी आए दिन किसी का दिल अपनी तरफ मोड़ लेते हैं और कुछ ही दिनों में उन्हें भी एेसा ढ़ाल देते हैं कि हर सप्ताह एक नए प्रेमी की तलाश में लग जाएं।) धत्! तुम लडक़ों पर क्या भरोसा, तुम लोग तो सिर्फ मुंह पर प्रसन्न करने की कला जानते हो। आज मैं मिली तो गेंद मेरे पाले में फेंक दी गयी, कल शोभा मिलेगी तो यही गेंद उसके पाले में। इस तरह जो भी मिले तुम लडक़े कुछ क्षण के लिए उसके ही होकर उसका चारण करना शुरु कर देते हो। हम लोगों का दिल ही एेसा है जो तुम लोगों पर विश्वास कर जाता है।
सूरज :- अच्छा तो कई लडक़ों ने तुम्हारा पहले भी विश्वास तोड़ चुके हैं क्या? कहां-कहां टूटा है यह विश्वास। खैर छोड़ो मैं तो यही कहूंगा कि जिस तरह इतने आए गये होगें उसी तरह एक बार मुझ पर भी विश्वास करके देखो। हो सकता है मैं उनसे अलग साबित हो जाऊं। यह भी बात तुम्हें कई लोग कह चुके होगें। लेकिन मैं भी तो अभी इससे ज्यादा नहीं कह सकता। हां इतना जरुर कह सकता हूं कि पटने-पटाने की कला में मैं निपुड़ ही होता तो आज नहीं दो वर्ष पूर्व ही तुम मेरे संपर्क में आ गयी होती। आज तो कहो ये भगवान की कैसी कृपा रही कि तुम इस वक्त मेरे पास आ गयी। नही ंतो कुछ ही निदो बाद हम दोनो बिछड़ जाते और दिल की तड़प् दिल में ही रह जाती।
यह कहते हुए सूरज रम्भा की तरफ हाथ बढ़ा देता है और गोरी कोमल कलाईयों को पकडक़र और पास लाने का हल्का प्रयास करता है। वह कसमसाते हुए कलाई छुड़ाने का नाटक करती है और स्वयं आकर उससे सट भी जाती है। यानि ऊपर से कुछ और लेकिन भीतरी इच्छा कुछ दूसरा स्पष्ट झलकता है। उसके इस भाव को देखकर समझने की कोशिश कर रहा था कि रम्भा मुंह पर अधखिलेेेे गुलाब की तरह मुस्कराहट बिखेरते हुए बोली :- अरे! छोड़ो ना। इस प्रहर में कोई देख लेगा तो क्या कहेगा। (यह कहते हुए वह थोड़ा उसके पास और खिसक गयी। उसके गालों पर एक निशान भी लगा दिए।)
यह देखकर सूरज चौंकते हुए बोला :- आंय! कोई कहेगा क्या? कहने वाला तुम्हारे यहां आने पर भी तो कह सकता है। (हाथ पर थोड़ा और बल देते हुए) आआे इस चद्दर में बैठ जाआे।
रम्भा :- (होंठो पर मुस्कराहट लेकर कसमसाते हुए और पास चली जाती है।) नहीं-नहीं छोड़ो मुझे डर लग रहा है।
सूरज :- (हंसते हुए) डरा सो मरा। आज तक तो डर के कारण ही हम बिन पानी मछली की तरह तडफ़ड़ाते रहे। आज हम यही तो बता देना चाहते हैं कि हम भी अब छोटे नहीं रहे। अच्छा-बुरा का ज्ञान हमें भी है। दुनिया देखकर जलती है तो जलने दो हमारे मिलन को कोई देखकर जलता है तो उसे हम कैसे रोक सकते हैं। जब उनके दिल में जल रही लकड़ी खत्म हो जाएगी तो स्वयं ही वे बुझ जाएंगे। हमें तो बताना है हम एक थे, एक हैं और एक रहंगे।
रम्भा :- ये तो तुम्हारा प्रवचन रहा सूरज। वास्तविकता तो भविष्य में होने वाला तेरा व्यवहार बताएगा। अभी इसके बारे में कुछ भी कहना बड़-बोलापन हो जाएगा। वक्त आने पर बड़े-बड़ों को बदलते देर नहीं लगती।
सूरज :- हंसते हुए भला तुमको। तुमको कौन भूल सकता है रम्भा जिंद्गी एक बार भूल सकती है लेकिन रम्भा चाहे जिसके भी दिल में आ जाए वह निकल नहीं सकती। यह तो कहो आज मैं पा लिया। नही ंतो पता नहीं कितने लोग तो अगले जन्म में पाने के लिए भी तेरा इंतजार करते रहेंगे।
यह सुन रम्भा अपने-आप में और गौरवाविंत महसूस करने लगी कि इसी बीच कुसुम के आने की आहट सुनाई दी। उसके पदचाप को तो सुनते ही रम्भा का पूरा शरीर शिथिल हो गया। एेसा लगा जैसे कुछ क्षण के लिए उसके शरीर में रक्त का दौड़ा ही बंद हो गया हो, लेकिन तुरत ही अपने को संभालते हुए बोली :- देखो अब कुसुम पर न्यौछावर होने का समय आ गया। वह भी इस चांदनी बेला में कुछ पल तेरे साथ गुजारने आ रही है। तुम उस पर भी उसी तरह न्यौछावर होगे जिस तरह स ेअब तक मुझ पर हो रहे थे।
इतना सुनते ही सूरज के होशो-हवास उड़ गये और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। झटके से उसकी नींद खुल जाती है। वह देखता है कि अरे ! ये तो नौ बज गये। उसे लग ही नहीं रहा था कि मैं स्वप्र देख रहा था कि रम्भा आयी थी।
सूरज जल्दी उठकर नित्यक्रिया करता है। इसी बीच उसके पिता शिव पूजन आ जाते हैं।
शिवपूजन :- (हंसते हुए) वाह बाबू साहब अब हमें यह समझना होगा कि आप भी पढऩे पर ज्यादा ध्यान दे दिए हैं। अब पढ़ाई छोड़ गाय-भैंस रखने व खेत को मनी-बटईया के बजाय अपने पास ही खेत रखने पर विचार किया जाए। भलाई इसी में है।
सूरज :- नहीं पापा आज सोने में देर हो गयी थी। इस कारण सुबह नींद नहीं खुल पाई। वरना आप तो जानते ही हैं कि सूर्य निकलने से पूर्व आपका सूरज मैदान में निकल पड़ता है। कभी एेसा तो होता नहीं था।
शिव पूजन :- हां मैंने नाम तो इसी कारण यह रखा था। हमें विश्वास था कि सूर्य की रोशनी से समाज को कम रोशन नहीं करेगा हमारा सूरज। लेकिन वे आशाएं धुमिल होती जा रही हैं। अच्छा जाआे नास्ता करके कुछ पढ़ लो फिर टहलने जाना। आज तो छुट्टी है और परीक्षा नजदीक आने पर छुट्टियों का उपयोग खेलने में नहीं पढऩे में करना चाहिए। क्योंकि तुम्हारे लिए यह बहुमूल्य समय है। इसे व्यर्थ जाने देना जिन्द्गी के प्रगति पथ का प्रथम दरवाजा बंद कर देने के समान है। इस समय का यदि समुचित उपयोग हो गया तो समझो दो वर्ष का परिश्रम सार्थक हो जाएगा, वरना$.$.$.$.$.$।
सूरज :- वरना क्या पापा।
शिव पूजन :- हमें विश्वास है कि तुम इतने समझदार हो कि आगे का खुद समझ गये होगे। हाईस्कूल तक जाते-जाते इतनी समझ तो गदहों में भी हो जाती है। मैं हमेशा बच्चों से कहता हूं कि पढ़ो और पास हो जाआे। ये कभी नहीं कि पढ़ोगे नही ंतो फेल हो जाआेगे।
सूरज :- ठीक है पापा जा रहा हूं।
शिव पूजन :- अरे! हां आजकल सोने के बाद तुम क्या बड़बड़ाते रहते हो। आज रात में बोल रहे थे। हमेशा दिमाग में कुछ खुराफात भरे रहते हो क्या?
इतना सुनते ही सूरज को जैसे लकवा मार दिया। चोर की दाढ़ी में तिनका। वह तो अभी इस विचार में खोया था कि रात्रि प्रहर में स्वप्र देख रहा था या वास्तविकता। अब वह इसमें खो गया कि स्वप्रिल बातें मुखारबिंदु से उगल भी रहा था, जो मेरे मन की क्षणिक शांति के साथ ही पिता की नजरों में हमेशा के लिए गिरा देने के लिए काफी है। सूरज धीरे-धीरे अपना प्रकाश खोता जा रहा था। उसके पास हिम्मत नहीं रह गयी थी कि क्या बोलूं। अब तो सब खेल बिगड़ गया। एेसा लग रहा था कि देखते ही देखते चंद समय में ही हंसी में बखेड़ा हो गया। उसके चेहरे की हवा स्पष्ट उड़ती हुई नजर आ रही थी। उसका चेहरा देख शिवपूजन भी विस्मय में पड़ गये। पड़े भी क्यों न? वे तो उसकी रात्रिक्रिया से बिल्कुल अनभिज्ञ थे उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्होंने कौन सा एेसा गुनाह कर दिया जिससे उसकी यह गति होने लगी। उनको यह भय भी सताने लगा कि बीच में ही सूरज के दादा न आ जाएं नही ंतो वे भी बहुत कडक़ मिजाजी हैं और इसको बहुत मानते हैं। निश्चय ही इसका खामियाजा शिव पूजन को भूगतना होगा। उसकी बढ़ती शिथिलता देख वे हंसते हुए बोले :- इतना शिथिल क्यों हो गये सूरज? कुछ बोलते क्यों नहीं?
इतना सुनते ही सूरज की एक बार तंद्रा टुटी लेकिन विचलन गति कम नहीं हुआ। वह संभलते हुए बोला :- कुछ तो नहीं पापा बस परीक्षा नजदीक आ जाने से चिंता बढ़ जाती है। क्या करुं मैं भी जानता हूं कि चिंता करना व्यर्थ है। फिर भी कुछ उल-जूलुल की बातें याद आने लगती हैं।
शिव पूजन :- चिंता से चतुराई कम होती है। व्यर्थ की सोच नहीं करनी चाहिए, वह भी निरर्थक। व्यक्ति की सोच हमेशा सार्थक होनी चाहिए जो स्वहित के साथ-साथ समाजहित में भी उपयुक्त हो। वह भी सिर्फ विचारों का पुलिंदा बनाते नहीं रहना चाहिए, एक मार्ग प्रशस्त कर उस पर कदम आगे बढ़ाना उपयुक्त होता है। फल तो अपने-आप चरण चूमेगा। यदि एक बार असफलता भी हाथ लगे तो उस मार्ग से विचलित न होकर असफलता के कारणों पर विचार कर उसे सुधारना जरुरी होता है। क्योंकि हर असफलता में कुछ ना कुछ सफलता का राज छिपा होता है और जितना बड़ा ख्वाब होता है उसी के हिसाब से अपना धैर्य भी रखना जरुरी है। जिस तरह बिना दुख रहित सुख भी एक दुख का कारण हो जाता है। उसी तरह बिना असफल हुए सफलता में भी कोई रस नहीं रह जाता। जब तक किसी पर दुख नहीं आता अपनों की पहिचान भी नहीं होती। हमेषा अपनी अच्छाईयों को अच्छा बनाए रखकर गलतियों पर ज्यादा विचार करना चाहिए और उस ‘हेतु’ पर विचार करते हुए आगे बढऩे का प्रयास ही मनुष्य का पथ अग्रसर करता है। यही मानव धर्म है।
पिता जी के मुख से निकला निरर्थक शब्द सूरज की चिंता को और बढ़ा दिया। वह सोचने लगा कि पिता जी को सबकुछ पता गया है। लेकिन पितृधर्म का निर्वाह करते हुए वे स्पष्ट नहीं कर रहे हैं। शेष तो उन्होंने दार्शनिक भाषा में सब समझा ही दिया।
लेकिन इस संकट की घड़ी में भी अपने को सामान्य करते हुए बोला- क्या करें पिता जी यह बात तो मैं भी दूसरों को सीखाता हूं। लेकिन जब अपने ऊपर पड़ती है तो नानी याद आने लगती है। लाख कोशिशों के बावजूद मानव मस्तिष्क ही एेसा है कि बोझ बढऩे के साथ ही व्यर्थ की चिन्ताएं भी बढ़ जाती है, साथ ही उस वक्त भगवान भी बहुत याद आने लगते हैं।
शिव पूजन :- देखो सिर्फ मन पुलाव न बनाया करो। मैं अच्छी तरह जानता हूं। तुम्हारी चिंता कितनी है और तुम कार्यों के प्रति कितने वफादार हो। यदि तुमको पारिवारिक चिंता भी होगी तो वह व्यर्थ है। यदि तुम इतने ही वफादार होते तो अपने मूल कार्यों की चिंता न कर व्यर्थ की बातों में समय न गवांते। देखो हमलोग भी पढ़ाई के समय सुबह न उठना पड़े इसके लिए अक्सर या तो लालटेन की बत्ती ही गिरा देते थे अथवा भोर में उठकर लालटेन को हिला देते थे, जिससे वो भभक जाए और बढऩे से मुक्ति मिल जाती थी। इसी कारण आज यहां ए$सी. की जगह गर्मी में भी बाहर खेत का काम देखना पड़ रहा है। इसके बावजूद भी साल भर का खाना मिलेगा कि नहीं इसका कोई भरोसा नहीं है। तुम भी उसी आेर कदम बढ़ाते दिख रहे हो। आखिर इस उम्र में चिंता किस बात की। तुम्हारी उम्र तो अभी भी खाने-खेलने और पढऩे की है। अभी बिना पारिवारिक जिम्मेदारी के चिंता कैसी। सबकुछ करने के लिए तो हम स्वयं हैं।
सूरज :- (रुहांसा जैसा मुंह बनाते हुए) यानि आपको मेरे ऊपर विश्वास ही नहीं रहा, फिर तो आपसे कुछ भी बात करना ही बेकार है पिता जी। इस स्थिति में तो हर बातें झुठी लगती हैं।
शिव पूजन :- (उसके चेहरे को भांपते हुए थोड़ा खुश करने की मुद्रा में आकर) नहीं मेरे कहने का मतलब यह नहीं है। फिर भी इतना तो तुम्हें लगना चाहिए कि दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त होना ही तुम्हारी मुक्ति है।
सूरज :- नहीं पापा आखिर आप ही बताएं जिस परिवार की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है उसका एक सदस्य होने के नाते कुछ हमारा भी सोचने का कर्तव्य बनता ही है।
शिव पूजन हंस पड़ते हैं। वह कहते हैं- ‘अच्छा तुम दर्शन की लम्बी-लम्बी बातें करना बहुत सीख गये हो। इस समय तुम्हारा परिवार के प्रति एक जिम्मेदारी है कि पढक़र अच्छा रिजल्ट दिखाआे। इसी में हम सभी गौरवांवित होंगे।’
सूरज- ठीक है पापा। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इस कर्तव्य को निभाने में ही हम सबकी भलाई है। यदि ऊपर वाला चाहा तो हम उसे भी आपको दिखा देंगे। इसे अभी बताने से क्या फायदा?
शिव पूजन :- एेसा काम चोर कहते हैं। परिणाम अपने पक्ष में न आने का मतलब है तुमसे कुछ चूक हुई है। कर्तव्य निर्वाह ही रिजल्ट अपने पक्ष में होना होता है।
सूरज :- जैसी आपकी आज्ञा।
शिव पूजन :- अच्छा जाआे अब नाश्ता कर लो और एक-दो घंटे पढऩे बैठो। इसके बाद ही कहीं जाना। दस तो अभी बज गये और तुम्हारे लिए जैसे अभी सूर्य निकल रहा है।
सूरज नाश्ता करने तो गया लेकिन मस्तक पर चिंता की लकीरें स्पष्ट पढ़ी जा सकती थी। वह इसी चिंता में डूबा था कि पिता जी ने क्या सुना, क्या मैं रम्भा-रम्भा चिल्ला तो नहीं रहा था। पिता जी को क्या-क्या पता चला इसका पता कैसे चलेगा? किसी तरह वह घर जाकर नाश्ता करने बैठा लेकिन उदर में भूख थोड़ी भी नहीं थी। जिसका मन कहीं दूसरी पत्तियों का सम्यक् हल ढूढने में लगा हो भला उसे भूख कैसे लग सकती है। किसी तरह मुंह जूठाकर चला आया और पिता जी के वाणी से निकले हुए शब्दों को सुलझाने का प्रयास करने लगा। वह किताबों को आगे रखे हुए था, लेकिन मन: मस्तिष्क कहीं और उड़ रहा था। बंसत में शरीर पसीने से भीगा जाना इसका स्पष्ट गवाह बन रहा था, जिसे किसी तरह छुपाने में लगा था। इसी बीच दो मित्र विमलेश और अजय आ गये।
जैसे किसी तथाकथित मित्र की दूसरों को पढ़ता देख जलन होता है और किसी बहाने उसमें व्यवधान डालना चाहता है। कुछ इसी तरह की विमलेश की भी आदत थी।
विमलेश :- यार तुम तो जब देखो पढ़ता ही रहता है। कुछ टहल लिया करों। हम तो जब भी पढऩे बैठते हैं दिमाग ही कहीं और जाकर बैठ जाता है। कभी भी पढऩे में मन नहीं लगता।
सूरज :- यही बात है। देखने में तो अवश्य पढ़ता हूं लेकिन किताबों को नहीं स्कूल के गलियारों को, कुछ मदमस्त चालों को, कुछ के मोहिनी बालों को पढ़ता रहता हूं। किताब तो सिर्फ हाथी के बाहरी दांत के समान सामने पड़ी रहती है। ये किताबें तो 24 घंटे में लगभग दस घंटे हमारे साथ लगी रहती हैं लेकिन इन पर दिमाग तो दूर नजरें भी कभी-कभी ही पड़ती हैं।
विमलेश :- चुप रह यार। तुम तो हमेशा सज्जन रहा है। सभी अध्यापक लोग भी जानते है। वहां भी हमेशा क्लासरुम में ही बैठा रहता था। फिर कैसे तुम भंवरा बन सकता हैं। झुठ-मुठ का दूसरों को मूर्ख क्यों बनाता है। पढ़ता है तो यह अच्छी बात है फिर इसे छुपा क्यों रहा है।
सूरज :- यही तो बात है मछली के कांटों में बंधी लकड़ी तब तक शांति ढंग से पानी पर तैरती रहती है जब तक कि कोई फंस न जाए, शिकारी तब तक हथियार उठाये खड़ा रहता जब तक शिकार पर सही निशाना लग जाय। यदि हम सज्जनता पहले से न दिखाएं तो हमारे जाल में आएगा कौन। आखिर कोई भी लफंगों के साथ तो जाना नहीं चाहता। इसलिए इतना बाह्य आडंबर तो आवश्यक है, लेकिन शरीर की बाह्य सज्जनता का मतलब यह नहीं हुआ कि मन भी स्थिर है। वह हर क्षण बैचेन रहता है। उन मछलियों को अपने जाल में फसाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। आखिर तुमलोग इस उम्र में कैसे सोच सकते हो कि हम इन कलियों से मंत्रमुग्ध नहीं हैं और शांत बैठे रहते हैं। यह तो असंभव कार्य है।
अजय :- (सीत्कार भरते हुए) यार तुम तो बहुत घाघ निकले। इधर तो मन के साथ तन भी चंचल हो उठता है। उसे रोक पाना भला किसी महान तपस्वी से कम है क्या? कभी-कभी तो करंट की तरह शरीर झटक जाता है। दिल में इतनी ज्वाला उठती है कि वह शूल की तरह चुभने लगती है। सिर्फ इंतजार रहता है कि कब गुरु जी जाएं जिससे नैनपान का अवसर का अवसर मिले। यदि एक बार उनके अधरों पर मुस्कान भर से दिल में कुछ-कुछ होने लगता है और अंतरमन में ही खो जाना पड़ता है। बस वही और वही याद आती हैं।
विमलेश :- तुम तो चुप रह यार। तुम तो सिर्फ अन्दर खाने में ही घूट-घूटकर मरते रहते हो। बाहर की हिम्मत तुममें न के बराबर है और जब तक कोई जोखिम नहीं उठाता तब तक उसका भला होने वाला नहीं है। तुमको तो यदि फूलों की बगिया में छोड़ दिया जाए तो सिर्फ मरते रह जाआेगे लेकिन अपनी घ्राणेंद्रियों तक का प्रयोग नहीं कर सकते। तेरी शरीर चाहे जितनी झटक जाए लेकिन उसमें हरक्कत नहीं होने वाली। वह स्थूल है।
सूरज :- (हंसते हुए) तुम ठीक कह रहे हो। कहीं भी अकेले जाने की बात आए तो सबसे पहले तैयार हो जाता है लेकिन खुला मैदान पाने पर भी कभी खुल नहीं पाता। हर जगह जाने से पहले तो बहुत भूमिका बनाता है। बगिया में पहुंचने से पहले ही इसके पांव दब जाते हैं। वहां तक जाते-जाते तो स्थिर हो उठते हैं और फिर दबे पांव ही वापस आ जाता है। इसकी दिल की धडक़ने भी चारगुना बढ़ जाती है। उस समय एेसे हांफता है कि मानों दिल का दौरा पड़ गया हो। इसका हाल सिधरी मछली की तरह है, जिसके चाल से दुश्मन हरक्कत में आ जाता है और खामियाजा रोहू को भूगतना पड़ता है। तुम्हें याद है जब हमलोग छठी में थे तो गुटखा खाने की आदत भी इसी ने दिलाया था। कैसे हमलोग पैसा चुराकर गुटखा खाने दुकान तक जाते थे और खाते वक्त एकांत में बैठे रहते थे। उस बीच भी यह कांपता रहता था जैसे इसे कंपन की बीमारी हो गयी हो।
विमलेश :- हां यह किसी कार्य से पूर्व बहुत सोचता रहता है और प्यार-वार या अन्य अनर्गल काम दिमाग से नहीं दिल से होता है। यही कारण है कि यह एेन वक्त से पूर्व ही पथभ्रमित हो जाता है और इसे मौके का फायदा उठाए बिना ही वापस आ जाना पड़ता है। मैं इसे बहुत समझाने की कोशिश किया लेकिन इसमें दृढ़ संकल्पित भावना पनप नहीं पाती। इसी कारण तो मौका मिलने के बावजूद घुटन में दम तोड़ता रहता है।
अजय :- हां भाई दूसरे के मड़वा में सबको गीत आती है लेकिन अपने पर जब पड़ती है तो हवा निकल जाती। मेरी बात तो बहुत कर रहे हो लेकिन तुमलोग ही आजतक क्या कर पाए। अब तक कई की बात तो छोड़ो एक भी वाटिका से फूल चुराना तो दूर उसका सुगंध तक नहीं ले पाए। एक बार तो तुम खुद ही एक वाटिका में पहुंचकर भी सुंगध लेने से वंचित रह गये। उस समय तो तेरे सारे दर्शन काफूर हो गये थे। दूसरों के कार्य मंचन में कमियां ही ढुढते रहते हो और जब स्वयं बढऩे का मौका मिला तो हवा निकल जाती है।
विमलेश :- नाराज क्यों हो गये। उस गलती को तो मैं भी स्वीकार करता हूं। उसको क्यों बार-बार याद दिलाते हो। उसकी याद आते ही मन मसक जाता है लेकिन गलती तो तब मांफ नहीं किया जाता जब बार-बार होती रही हो। एक बार गलती होने पर उसमें सुधार कर लिया जाए तो उसे गलती नहीं मानी जाती। आखिर एेसा तो है नहीं कि किसी से कोई गलती हो ही नहीं। गलतियां तो बार-बार होती रहती हैं। पिछली बार की गलती को देखते हुए ही मनुष्य अगली गलती न हो इसके लिए अपने में सुधार करता है। यही हमारा भी प्रयास होना चाहिए।
सूरज :- तू सही कहता है लेकिन यह भी तो सोचो कि जो समय निकल जाता है वह फिर लौटकर नहीं आता। वह अवसर तो सिर्फ सोचने भर का रह जाता है। क्या वह दिन, वह समय, वह वाटिका, वह सुगंध, वे नैना चार करने का मौका फिर कभी लौटकर आ सकता है। हाय! क्या अवसर था जिसे हाथ में आने के बाद तुमने गंवा दिया।
अजय :- तू सही कहता है। भगवान सबको एक बार मौका देता है। उसी का जो सही सदुपयोग कर लिया वह तो तृप्त हो जाता है, जो नहीं समझ पाया वह हाथ मलता रह जाता है। मैं ये नहीं कहता भाई कि मैं उन सदुपयोगी महान लोगों में हूं और तुम चूक गये। मैं भी तो तुम्हारी ही श्रेणी में तुमसे पीछे की लाईन में खड़ा हूं। आखिर क्या करें दिल-विल का मामला ही एेसा है कि हर जगह उडऩे लगता है लेकिन मोर्चे पर चढ़ते ही दिमाग ससूरा दिल को पीछे धकेल स्वयं आगे निकल जाता है। आज इतना जरुर आश्वस्त करता हूं कि एेसे जगहों पर अब मैं तुम लोगों को मौका दूंगा। स्वयं आतुरता नहीं दिखाऊंगा। सिर्फ तुमलोग नाकों में प्रवेश किये सुगंध , आंखों में भरे हुए सुंदर दूष्य का जो हिस्सा बाहर निकालोगे उसी सुगंध व दृष्य लीला सुनकर मन को शंात करने का प्रयास करुंगा।
(इतना कहते हुए अजय की आंखे भर आती है और वह भावविह्वल हो उठता है। आंखें बंद करके पुराने ख्याालातों को सोचते हुए झलमलाने लगता है। मन ही मन कहता है। हे भगवन दिमाग आखिर बनाए ही क्यों, सिर्फ दिल से ही काम चला देते तो अच्छा रहता।)
अजय के आंसू को देख सभी की हंसी-ठिठोली गायब हो गयी। विमलेश को तो काठ मार दिया, क्योंकि उसकी चर्चा तो पहले उसी ने शुरु किया था। दोनो उसको गले लगा लिए और समझाने लगे।
विमलेश :- अरे! यार दिल को इतना तोड़ देना मर्दानगी नहीं, यह तो लड़कियों के लक्षण हैं। मर्द तो बार-बार टूटता रहता है, फिर भी टूटन को जोडक़र जुटने का प्रयास जारी रखता है और अपने कामों में जुट जाता है। तुममें ये गिड़गिड़ाने और इतना विह्वल होने की आदत कहां से आ गयी। हमलोग भी कोई तीर तो मार नहीं दिए जिसे देख तुम वन वे रास्ता अपनाने लगे। हम भी तो तुम्हारी ही श्रेणी में हैं, फिर इन रढुंआें के बीच में रढु़आं प्रेमिका विरह में रोए इसका अर्थ नहीं निकलता। देख रहे हो सूरज यह बिल्कूल दिल का कमजोर निकला। यदि यही स्थिति रही तब तो काम हो चुका। जबकि मैदान में तुम सबसे आगे रहते हो लेकिन यहां उस पर पर्दा डाल संत बन गये। आखिर किसी बात को सोचकर तडफ़ड़ाहट में मरने से क्या फायदा। सिर्फ अपनी सांप-छछुंदर वाली चाल छोड़ दो तो और सब ठीक ही है। सिर्फ यही है कि तुम चूहा समझकर तो झपट्टा मारते हो लेकिन छछुन्दर समझकर छोडक़र चले आते हो।
सूरज :- यही तो बात है यार। यह छछुन्दर को छछुन्दर समझे तब तो ठीक ही है। यह तो वास्तव में चुहे को चुहा समझते हुए भी वहां पहुंचते ही सात्विक भाव में आ जाता है अथवा डर जाता है और उस शिकार को वहीं छोडक़र चला आता है।
अजय :- ( आंखों पर हाथ फेरते हुए गंभीर मुद्रा में कुछ जोश भरे हुए।) अच्छा भाई। इस समय पूरे अवगुण मुझमें ही आ गये हैं और तुमलोग अच्छे शिकारी बन चुके हो। तुमलोगों की वाणी तो एेसी ही है कि कहीं भी जाते हो तो बिना शिकार वापस नहीं आते लेकिन आज तक मैं एक भी शिकार करते नहीं देखा। जैसे सबलोग फूलों के सुगंध से वंचित हैं वैसे मैं भी हूं। फिर हममें तुममें अंतर ही क्या है? किस बात का ताना हमें सुना रहे हो। हमसे कहने से पहले अपने दिल में तो झांक कर देखो।
सूरज :- तुम खामख्वाह गुस्से से लाल हुए जा रहे हो। ये तो आपस में एक चर्चा हो रही है भाई। आखिर हमलोग आपस में ये सब बातें नहीं करेंगे तो किससे करने जाएंगे। मजाक हो या सामान्य बात ये सब तो आपस में किया जाएगा। जहां तक गलतियों का सवाल है गलती तो हम सब हर वक्त करते रहते हैं। सबसे बड़ी गलती तो यही है कि परीक्षा सिर पर है और हम लड़कियों की गलियों में मानसिक रंगरेलियां मना रहे हैं। जहां एक-एक पल का महत्व हो वहां हम ऐसे बैठकर गप-शप कर रहे हैं। इससे बड़ी गलती क्या हो सकती है। आखिर एक दिन हमारे द्वारा संचित सुज्ञान ही हमारे काम आएगा, व्यर्थ की ये गुलाब वाटिका नहीं। वह सुख एक क्षणिक मात्र है, जिसे हम सभी जानते हैं। लेकिन इसे जानते हुए भी कि इसमें हमारी मौत है कीट-पतंगों की भांति उसी दीपक के ईर्द-गिर्द हम टहलते रहते हैं।
विमलेश :- हां भाई। हम सब सिर्फ उनको देखते और उनकी चर्चा करते रह जाते हैं। यदि वे उत्तीर्ण
और हम अनुत्तीर्ण हो गये तो सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। उस समय हम उनके हंसी के पात्र हो जाएंगे। उनकी नजरों में भी हम हमेशा के लिए गिर जाएंगे। फिर तो वे कहां आकाश में और हम कहां गर्त होंगे। इसीलिए इस समय हमें पढ़ाई की चर्चा करनी चाहिए। वरना इन्हीं चर्चाआें के कारण किताबों को लेकर बैठने पर अथवा सोने पर हर वक्त मन में सिर्फ वही लोग तैरती रहती हैं।
सूरज :- यार, आज रात में तो गजब हो गया था।
यह बात सुनकर अजय में खुशी झलक गयी। उसके रुहांसी सा बना चेहरा मुस्करा उठा और आगे जानने की उत्सुकता बढ़ गयी।
अजय :- क्या कोई साक्षात दर्शन हुआ या आगे की बात बनी। सीढ़ी के अंतिम पावदान पर पहुंच चुके कि अभी अद्घकुंभ तक ही रह गये। कुंभ का इंतजार ही करना पड़ेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वप्र में ही सबकुछ हो गया।
(अजय के चेहरे पर प्रसन्नता देख सूरज व विमलेश भी अंदर ही अंदर प्रसन्न हो गये। माहौल थोड़ा रंगीनी की तरफ बढ़ा, क्योंकि उसके रुहांसी चेहरे से पूरा माहौल फीका पड़ गया था।)
सूरज :- बहुत खुब क्या कही तूने। तुम तो जैसे त्रिकालदर्शी हो। किसी के मन की बातों को भी इतने अच्छे ढंग से पढ़ लेते हो। यह तो अच्छे-अच्छे ज्योतिषियों को भी मात देने वाली बात है। यार पढ़ाई छोड़ यदि तुम ज्योतिष केन्द्र ही बना लेते तो अच्छी कमाई हो जाती। तुम्हारे द्वारा व्यक्त की गयी पहली संभावनाएं तो नहीं लेकिन अंतिम बिल्कूल सत्य है।
आज रात भोर तक किताबों को सामने रख इन्हीं सबका मन-पुलाव बनाता रहा। एक झुरमुट हमारी सौतन बन गयी और चांद तो इनके ख्यालों में खोने के लिए मजबूर कर ही रहा था। क्या बताएं अब आगे की बात बताना बहुत कठिन है। इससे दिल बैठा जा रहा है। झोंको के साथ वह चांदनी रात दिल में टिस पैदा करता जा रहा था। इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ सो गया और रम्भा इसी बीच आ गयी।
अजय :- (आश्चर्य से)क्या सचमूच।
सूरज :- (दिल पर हाथ फेरते हुए।) नहीं, स्वप्र में। (वह ख्वाबों में खो जाता है। कुछ देर बाद आहें भरते हुए।) एेसा लगता है कि मैं जो स्वप्र में देख रहा था उसी में डुबा हुआ कुछ बड़-बड़ा भी रहा था, जिसे बगल में ही सोए हुए पिता जी ने सब सुन लिया। मैं तुमलोगों के आने से पहले पापा से क्या कहें, वे सुने या नहीं, इन्हीं सब गुत्थियों को सुलझा रहा था। आज तो मैं तुमलोगों के आने तक दिमागशुन्य ही बना रहा।
अजय :- ये बता तू सपनों में था या सपना तुझमें था। किताबों को सामने रखकर किसी दूसरे गलियारे में खोना तो बहुत गलत है। इससे तुम पापा को नहीं खुद अपने-आप को धोखा देने के साथ ही सरस्वती मां से भी छल कर रहे हो। सही मानों तो जवानी से पहले ही तुम जवानी से इससे बैर की बीज बोते जा रहे हो जो जवां होते-होते चुभने लगेगी। इस तरह पढऩे से यदि रिजल्ट अशोभनीय रहा तो तुम घर वालों की नजर में दिमाग शून्य घोषित हो जाआेगे। मैं यह नहीं समझता कि कहीं से दिमाग खींचने की कोशिश की जाए और वह आने में असमर्थता जाहिर कर दे। क्योंकि यदि व्यक्ति दिमाग को कहीं एकाग्रचित्त करने का प्रयास करे तो अवश्य ही वह वहां केद्रिंत हो जाएगा। तुम लोग हमको फटकार लगाते हो। मैं समझता हूं कि तुम लोगों से तो मैं बेहतर ही हूं। भले मैं कम पढ़ता हूं लेकिन जबतक पढ़ता हूं हसनैन गलियों में दिमाग को टहलने नहीं देता। यदि हम कमल का फूल तोडऩे का प्रयास करेंगे तो दलदल में तो जाना ही पड़ेगा। इसीलिए कहा गया है सुंदरता देखने की चीज होती है तोडऩे की नहीं। सिर्फ देखो कुछ देर महसूस करो फिर भूल जाआे। इसी में हम सबकी भलाई है।
विमलेश :- वाह-वाह क्या दर्शन है। यह तो जानना चाहिए कि दर्शन व वास्तविकता में अंतर होता है। ये तो सभी कह देते हैं कि जगत एक माया है लेकिन उस माया से कोई मुक्त नहीं हो पाया है। तुम ये दर्शन पहले अपने ऊपर तो लागू करके देख लो। सूरज ने अपनी व्यथा सुलझाने के लिए अपनी व्यथाकथा सुनाई और तुम इसे दर्शन पढ़ाने लगे। जब व्यक्ति घावों से तड़प रहा होता है तो उसे होम्योपैथ नहीं तुरंत मरहम पट्टी की जरूरत होती है।
देखो सूरज फिलहाल तुम्हें यह भूलने की कोशिश करनी चाहिए कि पिता जी ने सब कुछ सुन लिया, क्योंकि यदि वे इस तरह की बातें सुने होते तो प्यार भरी बातें नहीं फटकार भरी बातें करते। रही बात सपनों में उनके आने की उसके दोशी हम सभी हैं, क्योंकि दिन भर जब उनकी ही बातें होती रहेंगी तो किताबों के सपने तो आएंगे नहीं। हमें आज से संकल्प लेना चाहिए कि परीक्षा तक जब भी मिलेंगे उनकी बातें न कर किताबों की ही बातें करेंगे। उनको कभी ख्यालों में नहीं लाएंगें, क्योंकि हमारे लिए वे जहर की घूंट होती जा रही हैं। उनकी बातें करने पर ध्यान भी किताबों की तरफ न जाकर उनके रुप में खोने लगता है जो हमारे लिए खतरनाक बन जाता है। उनसे ध्यान विमुख करने का यही तरीका है कि उनकी कभी हम चर्चा ना करें।
अजय :- सही बात है। मेरा यह वादा रहा। आज से उनकी चर्चा बंद। परीक्षा तक उनकी बातें हम कभी नहीं करेंगे। गजब है हमारा मन यह जानते हुए भी कि इस समय वे मीठा जहर हैं उन्हीं के ख्यालों में खोया रहता है। आज से हम पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई की बात करेंगे।
सूरज :- लेकिन इस बात से मेरे समस्या का कुछ हल नहीं निकला। पिता जी के मन का थाह कैसे लिया जाए हमें विचार इस पर करना चहिए। आखिर उनके मन को टटोलकर उसका हल तो निकालना जरूरी है। आखिर मन में उलझी गुत्थी जब तक सुलझे नहीं तब तक उसे कैसे शांत किया जा सकता है। मैं भी तो उधर से ध्यान हटा रहा हूं, लेकिन यह कोई वस्तु तो है नहीं जो जहां पर रख दिया वहीं का होकर रह गया। यह तो चलायमान रहता है और जहां भी बैठता है उसे सुलझााने का ही प्रयास करता है। हम इसके लिए क्यो करें?
अजय :- फिर वही बात। आखिर वे कुछ विशेष सुने होते तो कुछ जरूर डांटते। कुछ न डांटने का मतलब ही है कि उन्होंने कुछ सुना नहीं। आखिर तुम उस उलझन में ही क्यों पड़े हो। अनसुलझी बातों को ज्यादा सुलझाने का प्रयास करने पर उसके साथ ही अन्य कई बातें उलझा देती हैं। उस पर हमें विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए। आखिर यदि वे सुनें भी होंगे तो उसका यही तरीका है कि हम अपना परीक्षा परिणाम अच्छा दिखाएं और उनके मन को जीत लें।
सूरज :- ठीक है। आज से मैं भी मन के चोर को निकालने का प्रयास करुंगा। पहले तो अब घर में बैठकर पढऩे का प्रयास किया जाए। इससे प्रकृति के झरोंखों में मन न उड़ा करेगा।
इसी बीच अजय के पिता जी शंकर आ जाते हैं। उनका बिल्कूल जैसा नाम है काम से भी वे उसी तरह अवघड़ हैं और गुस्सा भी उनके नाक पर रहता है। गांजा खाना खाने से पहले व खाने के बाद तुरंत चलता है और दिन में हर घंटे चिलम चढ़ा रहना द्वार की इज्जत है। आंखे तो हर वक्त तरेरती ही रहती हैं। गाली तो उनके होठों पर सदा बैठी रहती है। उनको देखते ही सभी लोग मुंह छिपाने की कोशिश करने लगे। लेकिन वे सामने ही आ गये फिर एेसे में भगने की तो कोई जुगत दिख नहीं रही थी। अजय को तो बिल्कूल थरहा मार दिया था। उसको कुछ सुझ ही नहीं रहा था कि क्या बहाना बनाया जाए। सभी लोग किताबी चर्चा करने लगे।
इसी बीच शंकर की गर्जना हुई :- क्यों बे तू लोग यहां बैठकर तुमलोग क्या कर रहे हो? दिनभर सिर्फ गपशप करते रहते हो। पढ़ाई से तुमलोगों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रह गया है। इससे बढिय़ा तो चल कर कुछ खेती-बाड़ी का ही काम देखते तो बहुत कुछ बच जाता। तुम लोगों के लक्षण तो ठीक नहीं दिखते, हम तो उस जमाने में नवीं तक पास हो गये लेकिन तुमलोगों के लक्षण बता रहे हैं कि दसवीं नकल से भी नहीं निकाल पाआेगे।
सूरज :- अभी तो अजय आया है चाचा। थोड़ी पढ़ाई की चर्चा चल रही थी। अब तो परीक्षा भी नजदीक आ गयी है। इसलिए थोड़ा रणनीति बना रहे थे। आखिर परीक्षा नजदीक आने पर क्रमबद्घ ढंग से पढ़ाई तो करनी ही होती है। अब रटने से तो कुछ होगा नहीं। अब तो समय है सभी लोग आपस में अपनी-अपनी जानकारी को बांटे और एक दूसरे द्वारा किए गये ज्ञानार्जन का लाभ उठाएं।
शंकर :- (मन में गुस्सा लेकिन मुख पर हंसी का भाव दर्शात हुए।) तुमलोग पढ़ाई की रणनीति बना रहे हो या घर वालों को मूर्ख बनाने की। तुमलोग कितना पढ़ते हो यह तो कुछ ही दिनों में पता चल जाएगा। अरे, यदि पढ़ाई हुई हो तो ज्ञान बांटना समझ में आता है, जहां ज्ञान ही न हो वहां ज्ञानार्जन कैसा। अजय के लिए एक गाय तो पहले से ही खरीद रखा हूं। परिणाम आने पर दो गाय और आ जाएंगी। फेल होने पर तो इनकी आगे की पढ़ाई हो चुकी। शिव पूजन भईया से भी कहे देता हूं दो भैंस रख लें। इससे दुध बेंचकर कुछ पैसा आ जाएगा। पढ़ाई कितनी कर रहे हो यह तो जग-जाहिर है।
सूरज :- और हमलोग पास हो गये तो क्या विशेष उपहार देंगे। इसकी व्यवस्था किए हैं।
शंकर :- (हंसते हुए) पास होने का सवाल ही कहां है। वहां कोई तुक्का भिड़ाना तो है नहीं। वह परीक्षा है और पर इच्छा यहां बैठकर रणनीति बनाने से नहीं दी जा सकती। परीक्षा में बैठने से पूर्व जिसको कुछ भी जानकारी ही न हो वह नकल के भरोसे कितना काम कर सकता है, आखिर नकल के लिए भी तो इतनी जानकारी रहनी चाहिए कि कौन सा प्रश्न किस पेज पर है। हां यदि पास हो गये तो हमारी तरफ से एक घड़ी मिल जाएगी, जो तुमलोगों को समय याद दिलाने के लिए होगी।
सूरज :- बस घड़ी। फेल होने पर दो गाय और पास होने पर एक घड़ी। कम से कम दो गायों का ना सही एक गाय भर तो उपहार मिलना ही चाहिए।
शंकर :- घड़ी से ज्यादा क्या चाहिए? पास हो जाएंगे तो इनके ही तो काम आएंगे। उसमें मुझेतो हिस्सेदारी मिलनी नहीं है। सिर्फ मेरे पुत्र होने के कारण थोड़ी खुशी भर हो जाएगी।
सूरज :- अरे चाचा अभी तो हमारी खुशी आपकी खुशी है। हमारी तो इज्जत आपके ऊपर ही निर्भर है। हमारा अभी है ही क्या? यदि हम बढिय़ा अंक भी पाते हैं तो यही होगा कि फंला का लडक़ा बढिय़ा नबंर से उत्तीर्ण हुआ है। इससे हमसे ज्यादा तो आपकी इज्जत बढ़ेगी। हमारी औकात ही क्या है। हम तो सबकुछ आप लोगों के ऊपर निर्भर हैं, चाहे इज्जत हो अथवा अन्य निर्भरता।
शंकर :- हां आजकल तुम्हें बहुत लंबी-चौड़ी बातें आने लगी है। हम अपनी इज्जत के चलते ही एक घड़ी दे रहे है। सिर्फ इज्जत के शिवाय और क्या मिलना है। हम तो भगवान की दया से अब इतना कमा चुके हैं कि अपनी जिंद्गी का गुजर-बसर कर सकें। अब तो बस जो करना था कर चुके। अब ये अपना देखें, हमारी जिंद्गी का क्या है, अब तो हम अध-पके आम की तरह हो गये हैं बस इंतजार है पककर कब टपक जाएं या कोई आंधी आकर पकने से पहले ही कभी भी गिरा सकती है। अब तुमलोग अपना देखो हमलोंगो का क्या?
सूरज अब आगे कुछ नहीं बोल सका। सिर्फ मांफी मांग कर रह गया। उसका मुंह रुहासा जैसा बन गया। क्योंकि उसको अपने से ज्यादा बड़े लोग से बोलने का पछतावा होने लगा। वह सोचने लगा कि मैं भी फालतू का अजय के पापा से उलझ गया। हमें इस तरह की मुंहलगी नहीं करनी चाहिए। इसका परिणाम घर जाने पर संभवत: अजय को भूगतना पड़े। अब अजय मन ही मन मुझका गाली देगा, क्योंकि अजय के पापा की गुस्सैल प्रवृत्ति को सभी जानते थे। वे सूरज को भी कई बार पीट चुके थे। आज तो वह सुबह पता नहीं किस भले आदमी का मुंह देखा था कि इतना ढिठाई से बोलने के बाद भी उनके थप्पड़ का स्वाद लेने से रह गया। उसमें इतना बोलने की हिम्मत इस कारण हो गयी कि वे उसे गुदराते-पुचकारते भी रहते थे और वे उसे मुंह-लग्गु बना दिये थे। आज सबके मन में यह डर समा गया कि इसका खामियाजा अजय को भूगतना पड़ेगा। अजय झट से घर चला गया और किताब खोलकर बैठ गया। तब तक पीछे से शिव गुस्से में मुंह लाल किये हुए आ धमके
और बोले :- का रे, तू उन लोगों के साथ क्या गप हांक रहे थे। तुम्हारी बुद्घि बिल्कूल ध्वस्त हो चुकी है। तुमको मैं कितनी बार मना किया कि वहां जाकर बैठकी न लगाया कर फिर भी तू आदत से बाज नहीं आता। तुमको तो चस्का लग गया है लवन्डियाही की बात करने की एेसे में तुम कैसे मानोगे और शिव पूजन का पूत तो इस समय ज्यादा बोलने लगा है। एेसा ललागत है कि षि पूजन के भीबाप हो गईल है।
अजय :- ना पापा, मैं वहां बैठने नहीं बल्कि एक अनसुलझे सवाल को सूरज के साथ बैठकर सुलझाने गया था। उसका सूत्र वह जानता था। इस कारण मैं जाकर उसी को समझ रहा था।
शंकर :- हूं, हरामी दो दिन का छोकरा, तू मेरा भी बाप निकला। हम ही हो पढ़ाने चल दिया। ये नहीं जानता कि तू जो कर रहा है मैं ये सब करके छोड़ चुका हूं। ये दाढ़ी बाल इसी तरह नहीं पके हैं। यही सब करने के कारण आज यहां तुम्हारे जैसे नालायक को समझाना पड़ रहा है। वरना हम भी मंगलवा की तरह कहीं का अधिकारी रहते और ए$सी$ ऑफिस में बैठकर मजा लेते लेकिन नसीब में तो गोबर लिखा था फिर कैसे यह संभव था। देखो वो सुरेश लाला का खाने भर भी पैसा नहीं था उसके पास लेकिन दूसरों के घर खाकर और दूसरों के लालटेन से पढक़र गार्ड हो गया और आज लाल-हरी झंडी दिखाता हुआ पूरा देश घूम आता है। एक तुम हो जो कुछ सीखने का नाम ही नहीं लेते। (गहरी सांस लेते हुए) तुम भी अपने बाप के कदमों पर पैर रख चुके हो। इसका खामियाजा तुम्हें भी भूगतना होगा।
यहां मैं गाय-भैंस को नाद-चरन लगावत हैं और तुम, तुम वहां बैठकर गप हांक रहे हो। कह रहे हो कि सवाल पुछने गया था। कुछ खेत-वेत की चिंता नहीं है। कम से कम तुम इन्हें नाद-चरन लगा दिए होते तो मैं खेत ही घूम आता। आज करियावा सांड एक बिस्वा चना चर गया। खाने के लिए तुमको सबसे पहले चाहिए। इसकी फिक्र नहीं है कि इसकी जुगत कैसे करें? जब होगा ही नहीं तो खाआेगे क्या?
अजय :- मैं गप नहीं$.$.$.$.$.$.$.$.$।
अभी पूरी आवाज मुख से निकल नहीं पायी थी कि शिव के हाथ उसके गालों को लाल कर दिये। अजय तमतमा उठा। कंठ रुध गया, आंखों से झरना फूट पड़ा। मन की बात मन में ही दबा रह गया। चाहकर भी उसके कंठ बोलने में सक्षम नहीं रह सके। वह रोते हुए धीरे से खिसक गया। घर जाकर उसके आंखों से घंटों मोतियों से आंसू बहते रहे। उसके रोने का कारण ज्यादा चोट नहीं, बल्कि पापा के ऊपर क्रोध था जिसका जबाब देने अक्षम होने के कारण आंसू के रुप में फूट पड़े। वह अपने व सूरज के पापा की तुलना कर और आंसू बहाए जा रहा था। सोच रहा था कि वे कहां हर बात को समझाते हैं प्यार से और एक हैं जो हर वक्त दुत्कारते हैं। काश मैं उन्हीं के घर का रहता फिर कितना अच्छा होता। एक शिक्षित घर में पैदा होने के कितने फायदे होते हैं। इसका आज वह अनुभव कर रहा था।
इस वक्त वह आग-बबूला था। उसे देखने मात्र से एेसा लग रहा था कि उसके हाथ में कोई अस्त्र होता तो उसका प्रयोग करने में नहीं चूकता, लेकिन लाचार था। अब सिर्फ यह सोचने में लगा था कि कब हम इतना बलशाली होंगे कि पापा की हिम्मत मेरे ऊपर हाथ उठाने की न हो सके।
आखिर उसके मन में भी इस तरह का विचार आना उसकी गलती नहीं थी। यह उसने अपने परिवार से सीख रखा था। उसके बाबा और पापा भी तो अक्सर हर स्तर तक पहुंचने को उतारु हो जाते हैं। यहां तक कि दोनो को आमने-सामने गांजा पीने में भी कोई परहेज नहीं होता। एेसे में ऐसी भावना आ जाना उसकी गलती तो कही नहीं जा सकती। यहां तो सभी एक अपने बड़ों को देखकर ही सीखते हैं।
ऊधर अजय के पापा के जाने के बाद थोड़ी देर तक तो सूरज विमलेश भी इधर-उधर खिसक गये थे। लेकिन अजय के ऊपर कपडऩे वाली संभावित विपत्ति से सभी चिंतित थे। थोड़ी देर बाद ही दोनो हांफते-कांपते हुए इकट्ठा हो गये। उन्हें यह नहीं सूझ रहा था कि आगे क्या किया जाए। इस विपत्ति काल से कैसे उसे छुटकारा दिलाया जाए। कहीं वह ज्यादा डांट खाने पर मौत जैसी भयावहता पर विचार न करने लगे। नहीं तो पूरा दोषारोपण हम ही लोगों पर जाएगा। क्योंकि वह पहले भी एेसे विचार मन में कई बार ला चुका था। माथापच्ची करने के बावजूद कोई रास्ता निकलता न दिख रहा था। इसका कारण बिल्ली के गले में कौन चूहा घंटी बांधे। उनसे उलझने का मतलब था खुद को मुश्किल में डाल देना। ध्यान को तोड़ते हुए सूरज बोला :- अरे, यार आज तो गजब हो गया। अजय के पापा बहुत गुस्से में थे। वे उसे अवश्य मारेंगे और यदि उस पर मार पड़ी तो वह हमलोगों पर ही भड़ास निकालेगा। इसका कैसे उपाय निकाला जाए।
विमलेश :- आखिरकार इसमें हम कर ही क्या सकते हैं। तुम तो बीच में बोलकर फोड़े पर नमक छिडक़ दिए। चुप रहने पर हो सकता था कुछ न बोलें। तुमको तो कहीं भी रहा नहीं जाता बड़ों के बीच में भी बड़-बड़ा देते हो। तुम्हारी यही आदत कई बार उसे मार खिलवा चुकी है। अब इस बार देखो उस पर क्या बितती है बेचारे पर।
डांट के बाद हमें डांटे इस पर न विचार कर पहले हमें इस पर विचार करना चाहिए कि डांट के बाद कोई अपशकुन न कर डाले। इस कारण उसे अकेले में छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
सूरज :- हां, यार अब तो मुझे भी पछतावा हो रहा है। अजय के पापा बहुत गुस्से में थे। वे उसे अवश्य मारेंगे लेकिन मार के बाद वह कोई कदम न उठाए। इसका तो तुरंत कदम उठाना चाहिए। उस समय हमें भी बोलना तो नहीं चाहिए था, लेकिन क्या करें अजय को डांटते हुए हमें नहीं देखा जा रहा था। इस कारण हम बार-बार उस हाट-टाक को सामान्य करने की कोशिश कर रहा था। मैं तो यह सोच रहा था कि उनके गुस्से को शांत कर दूं। आखिर वे भी तो हम ही से कभी-कभी हंस लेते हैं। आज उसी हंसी को उनके मुखड़े पर लाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बाद में हमें भी लगा कि हंसी में बखेड़ा हो गया। अब तो जो हुआ सो हुआ, हमें आगे के राह के बारे में सोचना पड़ेगा। कुछ ना कुछ उसके बचाव के उपाय तो करने ही पड़ेंगे।
विमलेश :- आखिर हम कांटों में रास्ता ही क्या ढुढें। चाहे जितना कोशिश करें कांट हमें भी तो गडऩा ही है। यदि हम उसके बचाव में कुछ कहते भी हैं तो उनका गुस्सा और बढ़ता ही जाएगा। इसमें मामला बिगडऩे का डर है। हां, कांटा से कांटा निकालने का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। हो सकता है उससे कुछ काम बन जाए। यदि सफलता हाथ ना लगे तो उससे पूर्णतया तो असफल तो नहीं हो सकते।
सूरज :- कौन सा रास्ता है, जिसे हमलोग अपना सकते हैं।
विमलेश :- यदि अजय के बाबा को सब कुछ थोड़ा मिर्च-मसाला लगाकर बताया जाए तो हो सकता है सूरज अपने पापा के कोप-भाजन से बच जाए। वे अजय को बहुत मानते भी हैं और अजय का मार खाना वे बर्दास्त नहीं करेंगे। इसके लिए तो वे कई बार लड़ाई पर भी उतारू हो गये हैं।
सूरज :- हां, यार नुक्सा तो बहुत अच्छा है, चलो उनके यहां चलते हैं। पूरी उम्मीद है कि उनको हमलोग अपनी तरफ मोड़ लेंगे। उनको तो इतना भडक़ा दिया जाएगा कि वे खुद लाठी लेकर उनसे भीड़़ जाएंगे। शंकर चाचा की तो एेसी की तैसी कर देंगे। वे भी समझ जाएंगे। हां दादा के यहां जाने से पहले वाम वगैरह हाथ में लगाना होगा, क्योंकि असलियत कहने के लिए तो 36 गुण ही काफी है, लेकिन झूठ बोलने के लिए 72 गुण का होना जरूरी है।
विमलेश :- इस पर तो विचार कर लो कि वहां चलकर हमें क्या कहना है? क्या जो सच है वही बता देंगे या कुछ जोड़-घटाना लगाएंगे।
सूरज :- सत्यता में ही कुछ मिर्च-मसाला लगाते हुए बताएंगे।
jari hai
बंझे में भी कुछ फली आ जाती है।
हाथ में हाथ होने पर तो ठीक है,
पर अभागन के लिए रात कटिली हो जाती है।
कुछ इसी तरह का मौसम बन रहा है। बसंत तो एेसा मौसम ही है कि धरा के हर जीव जगत को हरा-भरा कर देता है। इस इठलाते गुदराते हुए मौसम में कुछ फसलों के गोंद में अंकुर आ चुके हैं तो कुछ पर आने का इंतजार है। किसान इन लहलहाती फसलों को देखकर तमाम सपने पिरो रहे हैं। अब पता नहीं, ये सपने पूरे भी होंगे कि प्रकृति की गोंद में ही दफन हो जाएंगे। दलहन के खेतों को सरसों के फूल पीतांबर आेढा रखे हैं। फली होने तक पता नहीं ये किसान के घर में जाएगा अथवा खेत में ही लाही का षिकार हो जाएगा। लेकिन अभी तो सबका दिल मोह ले रहे हैं। आखिर शैशवावस्था तो सबके लिए प्रिय होती ही है, चाहे वह पशु में सूअर का बच्चा ही क्यों न हो। एेसे में रसिक मिजाजी भंवरे इस अवसर को कहां छोडऩे वाले। वे चारो तरफ खेतों में घूम-घूमकर रस लेने और अठखेलियां करने से नहीं चूकते। तितलियां तो इन फूलों को छोड़ती ही नहीं। लेकिन उनके लिए सौतन बन गया है हवा का झोका, बार-बार बैठती हैं लेकिन यह झोका उन्हें पूर्ण रसास्वादन से वंचित कर देता है। इन झोंकों के सहारे तितलियों को हटाना एेसा लगता है कि इच्छा तो फूलों को भी तितलियों व भंवरों से सटे रहने की है ( क्योंकि इस रस का लेन-देन चित्त को प्रफुल्लित तो करता ही है।) लेकिन लोक-लाज के कारण उनसे मुंह छिपाकर इठला रहे हों। जिन पौधों में फली लग गयी है वे नन्हें बच्चे को गोंद में हिलोरे देकर सुला रही हैं। उनके पास न ही तितलियां आती है और न तो भंवरे। आखिर रसहीन गलियों में कोई रस तो लेने जाएगा नहीं। हां वहां कोई जाता है तो प्यार नहीं पेट की भूख मिटाने के लिए कीड़े। जो फसलों के गोंद को ही सूना कर देने पर तूले हुए है। फसलें अपने सामथ्र्य भर उन्हें हटाने का प्रयास तो करती हैं लेकिन उनका प्रयास असफल ही है। उनका दर्द चकला घर की वेश्याआें की तरह हो गया है जो सामाजिक पीड़ा के बावजूद हर वक्त मुस्कराने के लिए ही मजबूर होती हैं। फसलों को अब तो बस आसरा है इन बेदर्दी कीड़ों से बचे बच्चों को अपने गोंद में पालने का। आम में बऊर आ चुके हैं। उन पर भी कभी भवरें तो कभी तितलियां पहुंचने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। लेकिन लाही का इतना प्रकोप है कि बऊर तो क्या पत्तियां भी एेसे चिपचिपा रही हैं मानो उनको पसीने ने सराबोर कर दिया हो। कभी-कभी तो तितलियों के पंख पत्तियों में सटकर वहीं रह जाते हैं और वे हमेषा के लिए उड़ान न भरने के लिए मजबूर हो जाती हैं। यह लीला उसी तरह है जैसे दीपक पर कीड़े मरते रहने के बावजूद जाना नहीं छोड़ते।
यह ऋतु तो अभी शैशवावस्था में है लेकिन हर व्यक्ति के मन में बयार अभी से जवां हो चुकी है। अनाज कोठरी में आए अथवा नहीं किसान को भी इसकी चिंता कम बसंत के बसंत की चिंता ज्यादा है। क्योंकि उनके लिए तो बमुश्किल इस दिन का ही बसंती बयार है, फिर तो उन्हें जुटना होगा फसल की कटाई व मड़ाई में। और षरीर की थकान के बाद तो इश्कमिजाजी लोगों को भी कामदेव पर थकान भारी पड़ जाता है, सिर्फ कभी-कभी लोग भूख भर मिटा लेते हैं। वैसे इस वैज्ञानिक युग में तो बेमौसम ही लोग मौसम बना लेते हैं, बिना उम्र भी लोग जवां हो जाते हैं। हम तो पाश्चात्य की बुराई को ही लेने में मस्त हैं। उनकी अच्छाई तो कभी लिया नहीं, न ही लेने की संभावना है। इसी कारण आजकल तो चलन ही हो गया है कि कोई अपनी संस्कृति से हटकर काम करना है तो उसे मार्डन अथवा पाष्चात्य संस्कृति से जोड़ दो सब चल जाएगा। एेसा न होने पर सीनेमा युग कैसे आएगा। इसके लिए तो यह जरुरी ही है। आखिर बुद्घि का सदा दुरुपयोग करने वाला जगत का सर्वाधिक अंहकारी जीव भला मानव वक्त मिलने पर उसे कहां छोडऩे वाला। हमें तो जितनी अधिक बुद्घि मिलती है उतना अधिक उसका दुरुपयोग करने में लग जाते हैं। इसी मानव जगत को ही तो देखकर कुत्ते जैसे वफादार पशु भी आजकल मौसम के बंधन से मुक्त हो गये हैं। जहां हुआ जब हुआ मालिक की रखवारी छोड़ किसी चौराहे पर प्यार का इजहार करने जुट जाते हैं। आजकल सांड भैंसो से भी परहेज नहीं करते। इस वैज्ञानिक युग में मानव के लिए तो सबकुछ पैसा है। आज पैसे से जवानी भी खरीद ली जाती है। इसी कारण तो बड़े-बुढ़े भी किशोरावस्था में प्रवेष करने वाली युवतियों को भी सम्मोहित करने का कोई अवसर नहीं गंवाना चाहते। कुछ बची-खुची लोक-लाज अथवा पटाने में असमर्थ होने पर रोड न सही होटल में ही पैसे के बल पर ही बुलाकर पूरी रात प्यार का इजहार कर लेते हैं। होटलों में हर जगह इसकी व्यवस्था है ही, इसके बिना भला कौन होटल चल पाएगा। बूढ़े तो वे होते हैं जिनके पास पैसे नहीं हैं। उन गरीब भट्ठे आदि पर काम करने वाले बेचारों की तो जवानी क्या लरिकाई भी बुढ़ापे में तब्दील हो जाती है। एेसे में यदि प्रकृति साथ देने को उतारु हो जाए तो दो जून की रोटी की व्यवस्था करने में सक्षम भला कौन उसका लाभ लेने से वंचित रहना चाहेगा। इस मौसम में तो बिना हाड़-मांस वाले गलफड़े धंस चुके, नीचे से ध्वस्त हो चुके लोगों को भी बरबस जवानी याद आने लगती है। पशु, पक्षी हों या पेड़-पौधे सबको इस मौसम का इंतजार होता है, फिर एेसे में इन सबमें श्रेष्ठ माना जाने वाला प्राणी मानव जगत भला इससे कैसे अछूता रह सकता है।
किसी को दिन के वक्त इजहार करने को न मिले तो एक बार चल जाता है लेकिन रात तो सोने और अपनी किस्मत पर रोने या हंसने के लिए बनाई गयी है। आखिर रात्रि के प्रहर में तो चिडिय़ा भी अपने घोसले में ही रहना चाहती है। फिर भला मनुष्य को यदि अपने जोड़े के बिना रात काटनी पड़े तो कांटा से भी वह रात कटिली होना स्वभाविक है। इसी कारण तो आज अपनी जीवन साथी को छोडक़र बाहर रहने वाले दिल घर में परंतु शरीर किसी और को देने के लिए उतारु हो जाते हैं। यहां तक कि गांव भी अब षहरी जीवन से बहुत दूर नहीं है। इसका अंदाजा तो गांवों में अपनी पकड़ बना चुका एड्स से ही लगाया जा सकता है। अभी 2008 में ही इलाहाबाद में यमुनापार के एक गांव में दो बच्चों की मां ने अपने प्रेमी के लिए पति का टुकड़ा-टुकड़ा करके सुबूत मिटाने के लिए चुल्हे में जला दिया था। अब षारीरिक हवस मिटाने के लिए इस तरह की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं आम हो गयी हैं। यदि बसंत में अपनी बसंती न मिले तो घर में कैसे रहा जा सकता है। इस समय रात बहुत ज्यादा सुहानी होने के कारण यदि प्रेयसी के साथ सोने को न मिले तो रात में सोख्ते का गद्दा भी बेर के कांटे की तरह बैरी बन जाता है। एेसे में यदि रात चांदनी हो तो क्या कहना। उसमें भी यदि एकांत रहे तो तडफ़ड़ाना वर्णन से परे हो जाता है। यदि उम्र अभी कली से से फूल की तरफ बढऩे को अग्रसर हो और विभिन्न तरह के वातावरण से जूझ रहा हो तो निष्चय ही उसके दिल में ज्वार फूट उठेगा।
इसी तरह की पूर्णमासी की रात है। बादल का एक गुटका भी आकाष में दिखाई नहीं देता। चांद पूर्णतया प्रौढ़ावस्था में है और सूर्य की अनुपस्थिति में आकाष का राजा बना हुआ है। एेसा लगता है कि ठंडे दिमाग वाला चांद भी आज लोगों को तो शीतलता पहुंचा रहा है लेकिन सूर्य की रोटी पर पलते हुए भी वह उसी से दो-दो हाथ करने के मूड में आ गया है। आखिर अपनी जवानी पर गर्व और उसका दुरुपयोग करने का मौका मिले तो कौन चूकता है। चांद भी तो भले देव श्रेणी में है लेकिन इसी समाज की रोज मधुर बेला की गतिविधियां देख रहा है। जहां किसी स्त्री को देखकर नौकर को भी मालिक की भूमिका में आते देर नहीं लगती। आज तो जो जिसकी रोटी पर पलता है आगे बढ़ जाने पर उसी का गला काटने पर उतारु है। एेसे में यदि इस समाज की गतिविधियों को रोज देखने वाला चांद एक दिन थोड़ी देर के लिए लडऩे के मूड में आ ही गया है तो क्या बुरा कर रहा है।
उसकी रोषनी से घासों पर पड़ी आेस की बूंदें मोती से भी ज्यादा चमक रही हैं। ऐसा लग रहा है कि स्वर्ग का सारा आनंद आज धरा पर उतर आया है। आकाष में चांद के साथ-साथ तारे भी आकाश में टिमटिमा रहे हैं। इन बेचारों का तो हाल पुलिस की तरह हो गया है। जब सबका समय सोने का होता है तो इनकी ड्यूटी लगा दी जाती है। जब क्या करें फंस गये हैं ये लोग भी। थोड़ी सी गनीमत है कि इनका पूरा कुनबा ही आ गया है। पुलिस की तरह सेक्सुअल कुण्ठा का शिकार न बन जाएं इसलिए ये लोग लोक-लाज छोड़ बज्र बेहाया बनकर अमेरिकन सिस्टम अपना रहे हैं। खुले आसमान में ही बिना थके हुए अपनी प्रेमिका को पकडऩे के लिए हिरन की रफ्तार से दौड़ रहे हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि हिरनों ने इनसे ही प्रणय बनाना सीखा था।
इनका भी प्रयास करना लाजिमी ही है, क्योंकि ये भी तो उसी प्रकृति के एक अंग हैं और इस धरा पर कोई जीव इससे अछूता तो है नहीं। इसके बिना तो जिंद्गी ही अधूरी है। जब इससे ऋशि गण अछूते नहीं रह पाए तो फिर इन तारों की क्या विसात? जब बेचारों को घर में रहकर रात बिताने के लिए किस्मत में बदा ही नहीं है तो पशुआें की तरह बेहया बनने में ही कल्याण समझना होगा। उधर जब तक सूरज था इन लोगों को कहीं फटकने ही नहीं दिया। ये लोग भयभीत होकर दुबक कर छिपे हुए थे, क्योंकि उससे जीत पाने की उम्मीद तो येा धरा के जन्म होते ही छोड़ दिए थे। अब ड्यूटी के समय ही सही कुछ पल मिला है बादषाहियत दिखाने का उसे ये गवांना नहीं चाहते। इसी कारण इस समय चांद आसमान का बादषाह बनकर बैठ गया है और तारा गण की तरह भाग-दौड़ मचाते हुए मस्ती मना रहे हैं।
यह रात जितनी सुहानी है उतनी ही अभी फूल से कली की आेर अग्रसर सूरज के लिए कटीली है। इसी सुहानी रात में किताबें उसकी सौतन बनकर आ गयी हैं। वह भी तो चाहता है इनसे पीछा छुड़ाना लेकिन क्या करे मजबूरी है उसकी। इससे पीछा छुड़ाने का मतलब है जिंद्गी से पीछा छुड़ा लेना। क्योंकि डिसिप्लिन के मामले में कडक़ पिता जी उसका रहना दुष्वार कर देंगे। उनको चिंता इस बात की नहीं कि बेटवा ठीक-ठाक नौकरी पा जाए, बल्कि चिंता इसकी है कि षादी से पहले ही जो करना है वह कर ले ताकि षादी में अब तक खर्च किए गये पैसे को ब्याज सहित निकाला जा सके। अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाला लेकिन इस मामले में अपूर्ण, प्यार को न समझते हुए भी लड़कियों देखते ही दिल से चोटहिल हो जाने वाला, किसी एक पर न्यौछावर न होकर भंवरों की तरह अनेक फूलों पर भ्रमण करने वाला बेचारा सूरज गांव से लगभग सौ मीटर दूर ट्यूबेल पर कूर्सी-मेज लगाकर पढऩे बैठा है। उसकी परीक्षा अब सिर पर है, जिससे दिखावा ही सही लेकिन पढऩे बैठना उसकी मजबूरी है। क्योंकि उसके बगल में ही पिता जी की चारपाई है। वे आराम से खर्राटे भर रहे हैं। लेकिन सूरज्््! वह तो त्रिया भंवर में फंसे होने के कारण किताब आगे रहते हुए भी उससे कहीं इतर खोया हुआ है। बार-बार अपने को किताबों की तरफ मोडऩा चाहता है। लेकिन फिर कहीं खो जाता है। किताबों की तरफ ध्यान न जाने से वह बीच-बीच में घबड़ा भी जाता है। क्योंकि परीक्षा नजदीक है जिसमें फेल होने का भय सता रहा है। फिर भी क्या करे इस चांदनी रात में जो एक सामने झुरमुट मंद-मंद हवा के हिलोरों के साथ एक मद-मस्त लडक़ी की तरह एेसे हिल रहा है मानों उसे दावत दे रहा है कि मुझे चुम कर तो देखो। एक बार तो वह उसके पास जाकर देख भी आया है कि वह लडक़ी नहीं झुरमुट है लेकिन दिल नहीं मानता। फिर भी उधर से अपना ध्यान नहीं हटा पा रहा है। आखिर इसको कैसे हटा सकता है। दिल तो हमेषा भावनाआें में ही बहता है वह कभी हेतु पर तो विचार करता नहीं।
उसके मन में ज्वार फूट उठता है। आंखों से मोतियों के बूंद टपक पड़ती है। वह मन ही मन भगवान को कोसने लगता है और कहता है कि-
एक ही धरा पर तूने क्यों बनाया
दो तरह का इंसान।
कोई प्यार के लिए मरता जाए,
कोई इसे बना लिया अपनी शान।
इतनी बेमानी ठीक नहीं,
अरे हम भी तो तेरे बनाए हुए ही
हैं इंसान।
वह सिहर उठता है और मन ही मन कहता है कि हे देव जिस रात में हर कोई मुंह को ढककर अपनी प्रयेसी के साथ मस्त हो रहा हो वह रात मेरे लिए इतनी कश्टकारी हो गयी है। ये पुस्तकें आज हमारे गले की फांस बन गयी हैं। आखिर तुम्हारे भी अन्याय की कोई सीमा है अथवा नहीं। जब तुम्हें यही करना था तो फिर इतना बड़ा ही क्यों किया। दूध-मुंहा बच्चा ही बने रहने देता। कम से कम इन किताबों से मुक्ति मिलती। जब इस उम्र में उम्र का वास्तविक लाभ न मिले तो फिर एेसी जिंद्गी से क्या लाभ? फिर पुछता है-क्या फिर वह जमाना लौट नहीं सकता जब दस वर्श में ही षादी हो जाती थी। वह भी कितना अच्छा लगता होगा। आेह! भगवान ने इसका कोई हल नहीं निकाला। कल तक तो हम कम से कम विद्यालय के राह में ही वो चांद जैसा मुखड़ा, हिरनी जैसी चाल, मृगनैन देखा करते थे और आंखों में भरकर कुछ जिंदा रह लेते थे। लेकिन कल तो वे सभी जुदा हो जाएंगी हमसे। इंटर में तो हमारे और लड़कियों की कक्षाएं भी अलग-अलग चलती हैं। इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि औरतों की आवाज सुनाई पड़ती है। वह चौंक पड़ता है। अरे! सवेरा हो गया और सो जाता है।
इस बीच उसकी सहपाठी रम्भा आ जाती है। उसके आते ही सूरजके पैरों तले जमीन खिसक गयी। यह तो स्वाभाविक ही था, क्योंकि जिसके बारे में सोचने मात्र से नीचे के रोंगटे खड़े हो जाते थे यदि वास्तव में आज वह सामने खड़ी हो और वह भी एकांत तथा इस बसंत श्रृतु में तो निष्चय ही स्वर्ग सी छटा बिखेर देगी। यह पल उसके लिए वैसे ही था जैसे किसी ग्रामिण व्यक्ति को फाईव स्टार होटल का सूख मिल जाए। आखिर जिस चांद के टुकड़े को देखकर लोग कल्पनाआें में खो जाते हैं वह धब्बा रहित चांद आज खुद दीदार करने चला आया हो यह तो कल्पनाआें से परे था ही। अब तक तो वह उसके लिए उसी तरह उल्टे पांव रहता था जैसे पपीहा स्वाती नक्षत्र का एक बूंद पानी कंठ तले लेने के लिए पेड़ पर उल्टे पांव हमेषा लटकी रहती है। वह सोच नहीं पाता कि बात कैसे, क्या और कहां से षुरु करुं। किस सीमा तक रहना उपयुक्त होगा।
कुछ साहस करते हुए बोला रम्भा तुम! तुम कैसे इस अंधेरे दिल और उजाली रात में दिल में उजाला भरने आ गयी। मैं अभी भी नहीं समझ पा रहा हूं कि मैं सपने में हूं कि हकीकत देख रहा हूं। कालेज में तो तुम्हारे दीदार के लिए सभी तड़प् जाते थे। तुम्हारे एक दिन के दर्शन से आंखे हतों तर रहती थी और आज तुम यहां।
इतनी आवाज मुंह से निकली नहीं कि पूरा शरीर स्थूल हो गया। बालू के रेत की तरह एेसा लगने लगा कि ठोस होते हुए भी हवा का झोंका कहीं भी उड़ा ले जा सकता है। दिल 120 की रतार से भगने लगा मानों आेवर लोड बर्दास्त करने की क्षमता ही उसमें न रह गयी हो और बैठने के कगार पर आ गया। आखिर वह बैठे भी क्यों न इस तरह का अंहड़ आने पर तो बड़े-बड़े मैदान के मजे हुए खिलाडिय़ों के भी पसीने छूटने लगते हैं। उसमें भी जहां बगल में ही पिता जी की चारपाई लगी हो। वहां तो एक पल में ही सारी खुषी गम में भी बदलने का भय सता रहा था। सूरज तो अभी तक इन मामलों में पूर्ण भी नहीं हो पाया है। जो कालेज के राह में बात करने में अक्षम था वह भला पूर्णता की प्राप्ति पर कैसे सक्षम हो सकता था। वह इस चांदनी रात में चांद की गरिमा को ठेस भी नहीं पहुंचा सकता था, क्योंकि इस तरह की रात न तो कभी उसके जिंद्गी में आयी थी न ही भविश्य में आने की संभावना उसे दिख रही थी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बारे में सोचना उसके बस की बात नहीं रह गयी थी। रहे भी कैसे? क्या कभी फूलों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि स्वयं डाली से अलग होकर घ्राणेन्द्रियों को प्रफूल्लित कर देगें। लेकिन यहां तो वास्तव में कोई देषी गुलाब का फूल सिरहाने बैठकर पंखुडिय़ां फैलाए हुए नाकों तले खुषबू बिखेर रहा है। इसमें दिल की रतार अभी तक बंद नहीं हुई यही क्या कम है?
लड़कियां दिल की बात पढऩे में तो तेज होती हैं, सो रम्भा इन गतितिधियों से अनभिज्ञ कैसे रह सकती थी। सूरज का तेज कहीं आकाश से हमेशा के लिए गायब न हो जाए इस बात का एहसास करते हुए हंसती हुई झट से बोली :- प्यार का इजहार मंच पर नहीं होता। वहां तो सिर्फ सूटिंग होती है। यह अकेले में लेने-देने के लिए बनाया गया है। हमें नाटक तो करके पूरे समाज को दिखाना नहीं है। कुछ लोक-लाज भी तो है। सबके सामने वहां बोलना कैसे संभव था। फिर भी मैं जहां तक हो सके सबके बीच गंध कह लो या दुर्गंध उसे तुम्हारे नाकों तक पहुंचाने की कोशिश करती ही थी। नारी जाति को तो भगवान ने इतना साहस अभी तक नहीं दिया िकवह खुलकर किसी से अपने प्यार का इजहार कर सके। जितना तक संभव था मैंने पूरा जाल फेंक दिया। सोचती थी कभी न कभी तुम्हारी नाक तक मेरी गंध पहुंच ही जाएगी और उस प्यार के गंध को समझने में तुम सफल होगे। फिर हमारा मिलन संभव हो जाएगा। इसी सपने को संजोते हुए एक साल हमने$.$.$.$.$.$(लंबी सांस खीचते हुए) गुजार दिया। लेकिन तुम तो ठहरे निर्मोही। पता नहीं किस मिट्टी से भगवन ने तुम्हें बना दिया। कुछ दिन देखते-देखते सर्द हवाएं भी शरीर जलाने लगी फिर धीरे-धीरे बंसत बढऩे लगा तो हमारी सहन षक्ति जबाब दे गयी और आज ही मंदिर जाकर प्रथम प्रतिक्रिया स्वयं कर देने की भगवान से साहस मांगी और दिनभर उधेड़बून में रहने के बाद आज रात्रि को ही अपना बना लेने की कसम खा डाली और इजहार करने प्यार का अपना प्यास ले चली आयी तेरे पास। हमें उम्मीद है इस ललक में तू खलल ना डालकर प्यास को बूझा दोगे।
उसकी आवाज सुनकर सूरज को कुछ ढाढस बंधा और पिता की चारपाई की याद भूल सी गयी। वह थोड़ा रईस बनते हुए बोला :- तुम जानती तो हो हमें भी कुछ शर्म सी आती रहती है। तुम्हारे भोलेपन को तो मैं भी कनखियों से निहारता रहता था लेकिन क्या करें भगवान ने उतना साहस ही नहीं दिया जो मुख से इसका इजहार कर सकें। तुम समझती हो हो यह कलम व्यक्ति को हिजड़ा बना देती है। हर बात मुंह से निकालने से पहले यश-अपयश की तरफ दिमाग दौडऩे लगता है और वह इतना दौड़ता है कि तब तक इजहार का समय ही बीत चुका होता है। मैं तुम्हारी मुस्कान को देखकर म नही मन गद्गद हो उठता था। कभी-कभी साहस भी जुटाता था बोलने का लेकिन बोलने से पहले ही वो टूटकर बिखर जाता था। क्योंकि लड़कियों को पढऩे का अभी तक हमने किताब नहीं पढ़ा है। क्या बताऊं तुझे, कभी-कभी तो जाड़े के दिन में भी पसीने आ जाते थे। ज्यादा सोचने का कारण था कि भाई आजकल तो सभी लड़कियों की बात ही सही मानते हैं। यदि तुम शिकायत कर दी तो कोई भी तुम्हारी दिल छूने वाली उस हंसी पर तो गौर करेगा नहीं। वह तो सीधे दस जूता सजा देगा मेरे गालों पर और लेकर चला जाएगा पिता जी के पास जहां कितनी सजा मिलेगी यह मेरे कल्पना से परे है। इसके साथ ही हमेषा के लिए समाज में खूद ही गिर जाना पड़ेगा जो शायद इस जन्म में उठना मुश्किल होगा। यदि तुम्हें अवसर का इंतजार था तो हमें इशारे से ही कहीं अन्यत्र बुला लेती। यदि एक बार एेसा हो जाता तो फिर इस हंसी को बराबर मैं दिलों से निकलने नहीं देता और फिर कैद कर लेता हमेषा के लिए खूद रोज चला आता तेरी गलियों में जहां हम दोनो एक दूजे के हो सकें। मैं भी तो सदा तड़पता ही रहता था। लेकिन पहली बार (रोंगटे खड़े हो जाते हैं उसके).$.$.$.$.$। भला बताआे ये कैसी विडंबना है कि पौधा पानी बिना सूख रहा है और पानी बेकार में बह रहा है लेकिन उसके राह में कोई पौधा नहीं मिल रहा है। इस अंत पानी को बहते पूरे दो साल हो गये लेकिन पौधा तो तडफ़ड़ा ही गया। पानी का भी सदुपयोग नहीं हो पाया। धन्य हो समाज की बेडिय़ां। जिसने हमें इतना बांध के रखा है कि हम प्यार की आग पर दो बूंद पानी भी ना डाल सकें। रम्भा जो आग बुझाने के बजाय उसमें घी डालता हो, क्या उसका औचित्य में बने रहना उपयुक्त है।
रम्भा :- यह सच है कि समाज के कारण हम इतने दिनों से मिल नहीं पाए, लेकिन इस कच्ची उम्र में हम इन बेडिय़ों को तोड़ भी तो नहीं सकते। उसे तोडऩे का मतलब है अपने निवाले को ही खत्म कर देना। इसे खत्म करके हम जिंदा नहीं रह सकते। इतना भी हममें दम नहीं कि कहीं भट्ठे पर काम करके ही कुछ दाम निकाल लें और दूसरी नौकरियां मिलेगी नहीं। सुनी हूं फैक्ट्रियों में तो आजकल गेट से ही भगा देते हैं। जब तक हम उसी समाज के आसरे पर जिंदा हैं तब तक उसके नियमों को तोडऩा निवाले को खत्म करने के समान है। परीक्षा भी नजदीक है समाज क्या दीवार को भी इन गतिविधियों की भनक लग जाए तो जीना दुश्वार हो जाएगा। रिजल्ट कुछ अशोभनीय आया तो पूरे क्षेत्र के लोग तील का ताड़ बना देगें। नरक भी हमारी जिंद्गी से शर्माने लगेगा।
सूरज :- यह तो ठीक है लेकिन क्या तुम्हारा मन किताबों में बैठता है। यह कहीं इससे इतर नहीं भटकता। परीक्षा की तैयारी ठीक ढंग से हो पा रही है?
रम्भा :- यदि वही हो जाती तो फिर तेरे पास आने की शायद जरुरत न होती। उसी का तो सूत्र जानने और दिल में बरस रही आग पर पानी छिडक़ने इस रात में बात करने चली आयी। मन चचंलता तो इस समय और बढ़ गयी है किताब खोलते ही यह पता नहीं कहां से कहां तक पहुंच जाता है। इतनी स्पीड तो हवा में भी नहीं होगी जो इसमें है। दस मिनट रुका नहीं कि हवा का झोंका शुरु। एेसे में बेड़ा पार होना मुश्किल दिख रहा है। अब बहुत कोशिश करने पर तो एकाध प्रश्न याद हो पाते हैं जो आजकल ऊंट के मुंह में जीरा है। इस तरह से नईया कैसे पार होगी, समझ में नहीं आता।
सूरज :- कम से कम एक प्रश्न रोज याद कर लेती हो तो तुम्हारा तो बहुत ही ठीक कहा जाएगा। यहां तो एक प्रश्न दूर पहले से संचित किया हुआ भी बहे जा रहा है। किताब लेकर बैठने पर नींद तो उड़ जाती है लेकिन दिमाग भी किताबों से इतर ही उडऩे लगता है। किताबों में बैठाने की कोशिश भी नाकाम रहती है। खैर छोड़ो यह समय किताबी परीक्षा का नहीं दिल की आग पर पानी डालने का है। थोड़ा समय मिला है उसमें भी किताबी बात करने से कोई फायदा नहीं। दिल शांत रहेगा तो दिमाग किताबों में बैठेगा ही।
रम्भा :- (कुछ गंभीर हंसी हंसते हुए) अच्छा बताआे यह अंत:करण की तितली कहां-कहां उड़ती रहती है। कभी-कभी तो इसे शांत किसी एक के चित्त में बैठने के लिए कहो। कभी तितली का राह मेरे गलियारे से भी होकर गुजरता है कि नहीं।
सूरज :- देखो रम्भा मैं किसी के मुंह पर तो उसकी बड़ाई अथवा उससे कितना प्यार करता हूं यह जताना नहीं जानता। यदि एेसा जानकार ही रहता तो फिर दूसरों की भांति मैं भी अब तक बहुत ही सैर-सपाटा कर आता। लेकिन यदि तुम दिल का दर्द छेड़ ही दी हो तो सच बताता हूं कि यह चित्त तो दिन-रात तेरे ही गलियारे में भ्रमण करने के कारण किताबों में नहीं बैठ पाता। आखिर तुम्हें देखने के बाद कुछ बचता भी तो नहीं जिसकी तरफ चित्त को फेरा जाए। पूरे विद्यालय में दिल से हो या शरीर से कोई एेसी लडक़ी ही नहीं जिसके गलियारे मन घूम कर कुछ शांति पा ले। ये तो मैं ही नहीं खुद बनाने वाला भी सोचता होगा कि काष एेसी गढ़ाई फिर उसके हाथ से हो जाती। नजरें इनायत की तो बात ही छोड़ो बड़े-बड़े खिलाड़ी तुम्हे देख लेने मात्र से ही अपनी किस्मत का अहो-भाग्य मानते हैं। तुम्हारे आगे इस जिले में कोई रहा ही कहां जहां किसी की नजरें जा सकें।
रम्भा :- (मन ही मन गद्गद हो उठती है। आखिर हो भी क्यों न यहां तो अंगुठाछाप सफेद पोषाक के गदहे भी अपने चारण के लिए ही बहुतेरों को रखे होते हैं। गद्दी पाने के बाद हर अवगुणों में माहिर खद्दधारियों को भी भगवान बनाकर चालिसा लिख दिया जाता है और मजे की बात तो यह कि उसी भगवान से उसका विमोचन करा कर चारणकर्ता करोड़ों का वारा-न्यौरा भी करना बखुबी जानता है। फिर भाई त्रिया गुण तो बहुत पहले से ही चारण सुनने के लिए जाना जाता है। आखिर शादी के बाद पति द्वारा तो उसके बारे में चारण सुनाया नहीं जाएगा। वह तो कुछ दिन के बाद ही उसकी कमियों को उजागर करने के लिए बैठा रहता है। फिर एेसे में बेचारी युवतियां ऐसे कभी मिले हमराही से ही तो चारण सुनने की इच्छा रखती है। इसी कारण तो राह में अकेले राही को देखकर भी अधिकांश अपने शरीर को इठलाने लगती हैं, ताकि जाते-जाते कुछ सौंदर्य पर फब्तियां कस जाए। इससे उनके दिल को तसल्ली होती है और तुरत होठों पर मुस्कान आ जाता है। इसी का तो फायदा उठाकर बाजारु प्रेमी आए दिन किसी का दिल अपनी तरफ मोड़ लेते हैं और कुछ ही दिनों में उन्हें भी एेसा ढ़ाल देते हैं कि हर सप्ताह एक नए प्रेमी की तलाश में लग जाएं।) धत्! तुम लडक़ों पर क्या भरोसा, तुम लोग तो सिर्फ मुंह पर प्रसन्न करने की कला जानते हो। आज मैं मिली तो गेंद मेरे पाले में फेंक दी गयी, कल शोभा मिलेगी तो यही गेंद उसके पाले में। इस तरह जो भी मिले तुम लडक़े कुछ क्षण के लिए उसके ही होकर उसका चारण करना शुरु कर देते हो। हम लोगों का दिल ही एेसा है जो तुम लोगों पर विश्वास कर जाता है।
सूरज :- अच्छा तो कई लडक़ों ने तुम्हारा पहले भी विश्वास तोड़ चुके हैं क्या? कहां-कहां टूटा है यह विश्वास। खैर छोड़ो मैं तो यही कहूंगा कि जिस तरह इतने आए गये होगें उसी तरह एक बार मुझ पर भी विश्वास करके देखो। हो सकता है मैं उनसे अलग साबित हो जाऊं। यह भी बात तुम्हें कई लोग कह चुके होगें। लेकिन मैं भी तो अभी इससे ज्यादा नहीं कह सकता। हां इतना जरुर कह सकता हूं कि पटने-पटाने की कला में मैं निपुड़ ही होता तो आज नहीं दो वर्ष पूर्व ही तुम मेरे संपर्क में आ गयी होती। आज तो कहो ये भगवान की कैसी कृपा रही कि तुम इस वक्त मेरे पास आ गयी। नही ंतो कुछ ही निदो बाद हम दोनो बिछड़ जाते और दिल की तड़प् दिल में ही रह जाती।
यह कहते हुए सूरज रम्भा की तरफ हाथ बढ़ा देता है और गोरी कोमल कलाईयों को पकडक़र और पास लाने का हल्का प्रयास करता है। वह कसमसाते हुए कलाई छुड़ाने का नाटक करती है और स्वयं आकर उससे सट भी जाती है। यानि ऊपर से कुछ और लेकिन भीतरी इच्छा कुछ दूसरा स्पष्ट झलकता है। उसके इस भाव को देखकर समझने की कोशिश कर रहा था कि रम्भा मुंह पर अधखिलेेेे गुलाब की तरह मुस्कराहट बिखेरते हुए बोली :- अरे! छोड़ो ना। इस प्रहर में कोई देख लेगा तो क्या कहेगा। (यह कहते हुए वह थोड़ा उसके पास और खिसक गयी। उसके गालों पर एक निशान भी लगा दिए।)
यह देखकर सूरज चौंकते हुए बोला :- आंय! कोई कहेगा क्या? कहने वाला तुम्हारे यहां आने पर भी तो कह सकता है। (हाथ पर थोड़ा और बल देते हुए) आआे इस चद्दर में बैठ जाआे।
रम्भा :- (होंठो पर मुस्कराहट लेकर कसमसाते हुए और पास चली जाती है।) नहीं-नहीं छोड़ो मुझे डर लग रहा है।
सूरज :- (हंसते हुए) डरा सो मरा। आज तक तो डर के कारण ही हम बिन पानी मछली की तरह तडफ़ड़ाते रहे। आज हम यही तो बता देना चाहते हैं कि हम भी अब छोटे नहीं रहे। अच्छा-बुरा का ज्ञान हमें भी है। दुनिया देखकर जलती है तो जलने दो हमारे मिलन को कोई देखकर जलता है तो उसे हम कैसे रोक सकते हैं। जब उनके दिल में जल रही लकड़ी खत्म हो जाएगी तो स्वयं ही वे बुझ जाएंगे। हमें तो बताना है हम एक थे, एक हैं और एक रहंगे।
रम्भा :- ये तो तुम्हारा प्रवचन रहा सूरज। वास्तविकता तो भविष्य में होने वाला तेरा व्यवहार बताएगा। अभी इसके बारे में कुछ भी कहना बड़-बोलापन हो जाएगा। वक्त आने पर बड़े-बड़ों को बदलते देर नहीं लगती।
सूरज :- हंसते हुए भला तुमको। तुमको कौन भूल सकता है रम्भा जिंद्गी एक बार भूल सकती है लेकिन रम्भा चाहे जिसके भी दिल में आ जाए वह निकल नहीं सकती। यह तो कहो आज मैं पा लिया। नही ंतो पता नहीं कितने लोग तो अगले जन्म में पाने के लिए भी तेरा इंतजार करते रहेंगे।
यह सुन रम्भा अपने-आप में और गौरवाविंत महसूस करने लगी कि इसी बीच कुसुम के आने की आहट सुनाई दी। उसके पदचाप को तो सुनते ही रम्भा का पूरा शरीर शिथिल हो गया। एेसा लगा जैसे कुछ क्षण के लिए उसके शरीर में रक्त का दौड़ा ही बंद हो गया हो, लेकिन तुरत ही अपने को संभालते हुए बोली :- देखो अब कुसुम पर न्यौछावर होने का समय आ गया। वह भी इस चांदनी बेला में कुछ पल तेरे साथ गुजारने आ रही है। तुम उस पर भी उसी तरह न्यौछावर होगे जिस तरह स ेअब तक मुझ पर हो रहे थे।
इतना सुनते ही सूरज के होशो-हवास उड़ गये और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। झटके से उसकी नींद खुल जाती है। वह देखता है कि अरे ! ये तो नौ बज गये। उसे लग ही नहीं रहा था कि मैं स्वप्र देख रहा था कि रम्भा आयी थी।
सूरज जल्दी उठकर नित्यक्रिया करता है। इसी बीच उसके पिता शिव पूजन आ जाते हैं।
शिवपूजन :- (हंसते हुए) वाह बाबू साहब अब हमें यह समझना होगा कि आप भी पढऩे पर ज्यादा ध्यान दे दिए हैं। अब पढ़ाई छोड़ गाय-भैंस रखने व खेत को मनी-बटईया के बजाय अपने पास ही खेत रखने पर विचार किया जाए। भलाई इसी में है।
सूरज :- नहीं पापा आज सोने में देर हो गयी थी। इस कारण सुबह नींद नहीं खुल पाई। वरना आप तो जानते ही हैं कि सूर्य निकलने से पूर्व आपका सूरज मैदान में निकल पड़ता है। कभी एेसा तो होता नहीं था।
शिव पूजन :- हां मैंने नाम तो इसी कारण यह रखा था। हमें विश्वास था कि सूर्य की रोशनी से समाज को कम रोशन नहीं करेगा हमारा सूरज। लेकिन वे आशाएं धुमिल होती जा रही हैं। अच्छा जाआे नास्ता करके कुछ पढ़ लो फिर टहलने जाना। आज तो छुट्टी है और परीक्षा नजदीक आने पर छुट्टियों का उपयोग खेलने में नहीं पढऩे में करना चाहिए। क्योंकि तुम्हारे लिए यह बहुमूल्य समय है। इसे व्यर्थ जाने देना जिन्द्गी के प्रगति पथ का प्रथम दरवाजा बंद कर देने के समान है। इस समय का यदि समुचित उपयोग हो गया तो समझो दो वर्ष का परिश्रम सार्थक हो जाएगा, वरना$.$.$.$.$.$।
सूरज :- वरना क्या पापा।
शिव पूजन :- हमें विश्वास है कि तुम इतने समझदार हो कि आगे का खुद समझ गये होगे। हाईस्कूल तक जाते-जाते इतनी समझ तो गदहों में भी हो जाती है। मैं हमेशा बच्चों से कहता हूं कि पढ़ो और पास हो जाआे। ये कभी नहीं कि पढ़ोगे नही ंतो फेल हो जाआेगे।
सूरज :- ठीक है पापा जा रहा हूं।
शिव पूजन :- अरे! हां आजकल सोने के बाद तुम क्या बड़बड़ाते रहते हो। आज रात में बोल रहे थे। हमेशा दिमाग में कुछ खुराफात भरे रहते हो क्या?
इतना सुनते ही सूरज को जैसे लकवा मार दिया। चोर की दाढ़ी में तिनका। वह तो अभी इस विचार में खोया था कि रात्रि प्रहर में स्वप्र देख रहा था या वास्तविकता। अब वह इसमें खो गया कि स्वप्रिल बातें मुखारबिंदु से उगल भी रहा था, जो मेरे मन की क्षणिक शांति के साथ ही पिता की नजरों में हमेशा के लिए गिरा देने के लिए काफी है। सूरज धीरे-धीरे अपना प्रकाश खोता जा रहा था। उसके पास हिम्मत नहीं रह गयी थी कि क्या बोलूं। अब तो सब खेल बिगड़ गया। एेसा लग रहा था कि देखते ही देखते चंद समय में ही हंसी में बखेड़ा हो गया। उसके चेहरे की हवा स्पष्ट उड़ती हुई नजर आ रही थी। उसका चेहरा देख शिवपूजन भी विस्मय में पड़ गये। पड़े भी क्यों न? वे तो उसकी रात्रिक्रिया से बिल्कुल अनभिज्ञ थे उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्होंने कौन सा एेसा गुनाह कर दिया जिससे उसकी यह गति होने लगी। उनको यह भय भी सताने लगा कि बीच में ही सूरज के दादा न आ जाएं नही ंतो वे भी बहुत कडक़ मिजाजी हैं और इसको बहुत मानते हैं। निश्चय ही इसका खामियाजा शिव पूजन को भूगतना होगा। उसकी बढ़ती शिथिलता देख वे हंसते हुए बोले :- इतना शिथिल क्यों हो गये सूरज? कुछ बोलते क्यों नहीं?
इतना सुनते ही सूरज की एक बार तंद्रा टुटी लेकिन विचलन गति कम नहीं हुआ। वह संभलते हुए बोला :- कुछ तो नहीं पापा बस परीक्षा नजदीक आ जाने से चिंता बढ़ जाती है। क्या करुं मैं भी जानता हूं कि चिंता करना व्यर्थ है। फिर भी कुछ उल-जूलुल की बातें याद आने लगती हैं।
शिव पूजन :- चिंता से चतुराई कम होती है। व्यर्थ की सोच नहीं करनी चाहिए, वह भी निरर्थक। व्यक्ति की सोच हमेशा सार्थक होनी चाहिए जो स्वहित के साथ-साथ समाजहित में भी उपयुक्त हो। वह भी सिर्फ विचारों का पुलिंदा बनाते नहीं रहना चाहिए, एक मार्ग प्रशस्त कर उस पर कदम आगे बढ़ाना उपयुक्त होता है। फल तो अपने-आप चरण चूमेगा। यदि एक बार असफलता भी हाथ लगे तो उस मार्ग से विचलित न होकर असफलता के कारणों पर विचार कर उसे सुधारना जरुरी होता है। क्योंकि हर असफलता में कुछ ना कुछ सफलता का राज छिपा होता है और जितना बड़ा ख्वाब होता है उसी के हिसाब से अपना धैर्य भी रखना जरुरी है। जिस तरह बिना दुख रहित सुख भी एक दुख का कारण हो जाता है। उसी तरह बिना असफल हुए सफलता में भी कोई रस नहीं रह जाता। जब तक किसी पर दुख नहीं आता अपनों की पहिचान भी नहीं होती। हमेषा अपनी अच्छाईयों को अच्छा बनाए रखकर गलतियों पर ज्यादा विचार करना चाहिए और उस ‘हेतु’ पर विचार करते हुए आगे बढऩे का प्रयास ही मनुष्य का पथ अग्रसर करता है। यही मानव धर्म है।
पिता जी के मुख से निकला निरर्थक शब्द सूरज की चिंता को और बढ़ा दिया। वह सोचने लगा कि पिता जी को सबकुछ पता गया है। लेकिन पितृधर्म का निर्वाह करते हुए वे स्पष्ट नहीं कर रहे हैं। शेष तो उन्होंने दार्शनिक भाषा में सब समझा ही दिया।
लेकिन इस संकट की घड़ी में भी अपने को सामान्य करते हुए बोला- क्या करें पिता जी यह बात तो मैं भी दूसरों को सीखाता हूं। लेकिन जब अपने ऊपर पड़ती है तो नानी याद आने लगती है। लाख कोशिशों के बावजूद मानव मस्तिष्क ही एेसा है कि बोझ बढऩे के साथ ही व्यर्थ की चिन्ताएं भी बढ़ जाती है, साथ ही उस वक्त भगवान भी बहुत याद आने लगते हैं।
शिव पूजन :- देखो सिर्फ मन पुलाव न बनाया करो। मैं अच्छी तरह जानता हूं। तुम्हारी चिंता कितनी है और तुम कार्यों के प्रति कितने वफादार हो। यदि तुमको पारिवारिक चिंता भी होगी तो वह व्यर्थ है। यदि तुम इतने ही वफादार होते तो अपने मूल कार्यों की चिंता न कर व्यर्थ की बातों में समय न गवांते। देखो हमलोग भी पढ़ाई के समय सुबह न उठना पड़े इसके लिए अक्सर या तो लालटेन की बत्ती ही गिरा देते थे अथवा भोर में उठकर लालटेन को हिला देते थे, जिससे वो भभक जाए और बढऩे से मुक्ति मिल जाती थी। इसी कारण आज यहां ए$सी. की जगह गर्मी में भी बाहर खेत का काम देखना पड़ रहा है। इसके बावजूद भी साल भर का खाना मिलेगा कि नहीं इसका कोई भरोसा नहीं है। तुम भी उसी आेर कदम बढ़ाते दिख रहे हो। आखिर इस उम्र में चिंता किस बात की। तुम्हारी उम्र तो अभी भी खाने-खेलने और पढऩे की है। अभी बिना पारिवारिक जिम्मेदारी के चिंता कैसी। सबकुछ करने के लिए तो हम स्वयं हैं।
सूरज :- (रुहांसा जैसा मुंह बनाते हुए) यानि आपको मेरे ऊपर विश्वास ही नहीं रहा, फिर तो आपसे कुछ भी बात करना ही बेकार है पिता जी। इस स्थिति में तो हर बातें झुठी लगती हैं।
शिव पूजन :- (उसके चेहरे को भांपते हुए थोड़ा खुश करने की मुद्रा में आकर) नहीं मेरे कहने का मतलब यह नहीं है। फिर भी इतना तो तुम्हें लगना चाहिए कि दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त होना ही तुम्हारी मुक्ति है।
सूरज :- नहीं पापा आखिर आप ही बताएं जिस परिवार की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है उसका एक सदस्य होने के नाते कुछ हमारा भी सोचने का कर्तव्य बनता ही है।
शिव पूजन हंस पड़ते हैं। वह कहते हैं- ‘अच्छा तुम दर्शन की लम्बी-लम्बी बातें करना बहुत सीख गये हो। इस समय तुम्हारा परिवार के प्रति एक जिम्मेदारी है कि पढक़र अच्छा रिजल्ट दिखाआे। इसी में हम सभी गौरवांवित होंगे।’
सूरज- ठीक है पापा। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इस कर्तव्य को निभाने में ही हम सबकी भलाई है। यदि ऊपर वाला चाहा तो हम उसे भी आपको दिखा देंगे। इसे अभी बताने से क्या फायदा?
शिव पूजन :- एेसा काम चोर कहते हैं। परिणाम अपने पक्ष में न आने का मतलब है तुमसे कुछ चूक हुई है। कर्तव्य निर्वाह ही रिजल्ट अपने पक्ष में होना होता है।
सूरज :- जैसी आपकी आज्ञा।
शिव पूजन :- अच्छा जाआे अब नाश्ता कर लो और एक-दो घंटे पढऩे बैठो। इसके बाद ही कहीं जाना। दस तो अभी बज गये और तुम्हारे लिए जैसे अभी सूर्य निकल रहा है।
सूरज नाश्ता करने तो गया लेकिन मस्तक पर चिंता की लकीरें स्पष्ट पढ़ी जा सकती थी। वह इसी चिंता में डूबा था कि पिता जी ने क्या सुना, क्या मैं रम्भा-रम्भा चिल्ला तो नहीं रहा था। पिता जी को क्या-क्या पता चला इसका पता कैसे चलेगा? किसी तरह वह घर जाकर नाश्ता करने बैठा लेकिन उदर में भूख थोड़ी भी नहीं थी। जिसका मन कहीं दूसरी पत्तियों का सम्यक् हल ढूढने में लगा हो भला उसे भूख कैसे लग सकती है। किसी तरह मुंह जूठाकर चला आया और पिता जी के वाणी से निकले हुए शब्दों को सुलझाने का प्रयास करने लगा। वह किताबों को आगे रखे हुए था, लेकिन मन: मस्तिष्क कहीं और उड़ रहा था। बंसत में शरीर पसीने से भीगा जाना इसका स्पष्ट गवाह बन रहा था, जिसे किसी तरह छुपाने में लगा था। इसी बीच दो मित्र विमलेश और अजय आ गये।
जैसे किसी तथाकथित मित्र की दूसरों को पढ़ता देख जलन होता है और किसी बहाने उसमें व्यवधान डालना चाहता है। कुछ इसी तरह की विमलेश की भी आदत थी।
विमलेश :- यार तुम तो जब देखो पढ़ता ही रहता है। कुछ टहल लिया करों। हम तो जब भी पढऩे बैठते हैं दिमाग ही कहीं और जाकर बैठ जाता है। कभी भी पढऩे में मन नहीं लगता।
सूरज :- यही बात है। देखने में तो अवश्य पढ़ता हूं लेकिन किताबों को नहीं स्कूल के गलियारों को, कुछ मदमस्त चालों को, कुछ के मोहिनी बालों को पढ़ता रहता हूं। किताब तो सिर्फ हाथी के बाहरी दांत के समान सामने पड़ी रहती है। ये किताबें तो 24 घंटे में लगभग दस घंटे हमारे साथ लगी रहती हैं लेकिन इन पर दिमाग तो दूर नजरें भी कभी-कभी ही पड़ती हैं।
विमलेश :- चुप रह यार। तुम तो हमेशा सज्जन रहा है। सभी अध्यापक लोग भी जानते है। वहां भी हमेशा क्लासरुम में ही बैठा रहता था। फिर कैसे तुम भंवरा बन सकता हैं। झुठ-मुठ का दूसरों को मूर्ख क्यों बनाता है। पढ़ता है तो यह अच्छी बात है फिर इसे छुपा क्यों रहा है।
सूरज :- यही तो बात है मछली के कांटों में बंधी लकड़ी तब तक शांति ढंग से पानी पर तैरती रहती है जब तक कि कोई फंस न जाए, शिकारी तब तक हथियार उठाये खड़ा रहता जब तक शिकार पर सही निशाना लग जाय। यदि हम सज्जनता पहले से न दिखाएं तो हमारे जाल में आएगा कौन। आखिर कोई भी लफंगों के साथ तो जाना नहीं चाहता। इसलिए इतना बाह्य आडंबर तो आवश्यक है, लेकिन शरीर की बाह्य सज्जनता का मतलब यह नहीं हुआ कि मन भी स्थिर है। वह हर क्षण बैचेन रहता है। उन मछलियों को अपने जाल में फसाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। आखिर तुमलोग इस उम्र में कैसे सोच सकते हो कि हम इन कलियों से मंत्रमुग्ध नहीं हैं और शांत बैठे रहते हैं। यह तो असंभव कार्य है।
अजय :- (सीत्कार भरते हुए) यार तुम तो बहुत घाघ निकले। इधर तो मन के साथ तन भी चंचल हो उठता है। उसे रोक पाना भला किसी महान तपस्वी से कम है क्या? कभी-कभी तो करंट की तरह शरीर झटक जाता है। दिल में इतनी ज्वाला उठती है कि वह शूल की तरह चुभने लगती है। सिर्फ इंतजार रहता है कि कब गुरु जी जाएं जिससे नैनपान का अवसर का अवसर मिले। यदि एक बार उनके अधरों पर मुस्कान भर से दिल में कुछ-कुछ होने लगता है और अंतरमन में ही खो जाना पड़ता है। बस वही और वही याद आती हैं।
विमलेश :- तुम तो चुप रह यार। तुम तो सिर्फ अन्दर खाने में ही घूट-घूटकर मरते रहते हो। बाहर की हिम्मत तुममें न के बराबर है और जब तक कोई जोखिम नहीं उठाता तब तक उसका भला होने वाला नहीं है। तुमको तो यदि फूलों की बगिया में छोड़ दिया जाए तो सिर्फ मरते रह जाआेगे लेकिन अपनी घ्राणेंद्रियों तक का प्रयोग नहीं कर सकते। तेरी शरीर चाहे जितनी झटक जाए लेकिन उसमें हरक्कत नहीं होने वाली। वह स्थूल है।
सूरज :- (हंसते हुए) तुम ठीक कह रहे हो। कहीं भी अकेले जाने की बात आए तो सबसे पहले तैयार हो जाता है लेकिन खुला मैदान पाने पर भी कभी खुल नहीं पाता। हर जगह जाने से पहले तो बहुत भूमिका बनाता है। बगिया में पहुंचने से पहले ही इसके पांव दब जाते हैं। वहां तक जाते-जाते तो स्थिर हो उठते हैं और फिर दबे पांव ही वापस आ जाता है। इसकी दिल की धडक़ने भी चारगुना बढ़ जाती है। उस समय एेसे हांफता है कि मानों दिल का दौरा पड़ गया हो। इसका हाल सिधरी मछली की तरह है, जिसके चाल से दुश्मन हरक्कत में आ जाता है और खामियाजा रोहू को भूगतना पड़ता है। तुम्हें याद है जब हमलोग छठी में थे तो गुटखा खाने की आदत भी इसी ने दिलाया था। कैसे हमलोग पैसा चुराकर गुटखा खाने दुकान तक जाते थे और खाते वक्त एकांत में बैठे रहते थे। उस बीच भी यह कांपता रहता था जैसे इसे कंपन की बीमारी हो गयी हो।
विमलेश :- हां यह किसी कार्य से पूर्व बहुत सोचता रहता है और प्यार-वार या अन्य अनर्गल काम दिमाग से नहीं दिल से होता है। यही कारण है कि यह एेन वक्त से पूर्व ही पथभ्रमित हो जाता है और इसे मौके का फायदा उठाए बिना ही वापस आ जाना पड़ता है। मैं इसे बहुत समझाने की कोशिश किया लेकिन इसमें दृढ़ संकल्पित भावना पनप नहीं पाती। इसी कारण तो मौका मिलने के बावजूद घुटन में दम तोड़ता रहता है।
अजय :- हां भाई दूसरे के मड़वा में सबको गीत आती है लेकिन अपने पर जब पड़ती है तो हवा निकल जाती। मेरी बात तो बहुत कर रहे हो लेकिन तुमलोग ही आजतक क्या कर पाए। अब तक कई की बात तो छोड़ो एक भी वाटिका से फूल चुराना तो दूर उसका सुगंध तक नहीं ले पाए। एक बार तो तुम खुद ही एक वाटिका में पहुंचकर भी सुंगध लेने से वंचित रह गये। उस समय तो तेरे सारे दर्शन काफूर हो गये थे। दूसरों के कार्य मंचन में कमियां ही ढुढते रहते हो और जब स्वयं बढऩे का मौका मिला तो हवा निकल जाती है।
विमलेश :- नाराज क्यों हो गये। उस गलती को तो मैं भी स्वीकार करता हूं। उसको क्यों बार-बार याद दिलाते हो। उसकी याद आते ही मन मसक जाता है लेकिन गलती तो तब मांफ नहीं किया जाता जब बार-बार होती रही हो। एक बार गलती होने पर उसमें सुधार कर लिया जाए तो उसे गलती नहीं मानी जाती। आखिर एेसा तो है नहीं कि किसी से कोई गलती हो ही नहीं। गलतियां तो बार-बार होती रहती हैं। पिछली बार की गलती को देखते हुए ही मनुष्य अगली गलती न हो इसके लिए अपने में सुधार करता है। यही हमारा भी प्रयास होना चाहिए।
सूरज :- तू सही कहता है लेकिन यह भी तो सोचो कि जो समय निकल जाता है वह फिर लौटकर नहीं आता। वह अवसर तो सिर्फ सोचने भर का रह जाता है। क्या वह दिन, वह समय, वह वाटिका, वह सुगंध, वे नैना चार करने का मौका फिर कभी लौटकर आ सकता है। हाय! क्या अवसर था जिसे हाथ में आने के बाद तुमने गंवा दिया।
अजय :- तू सही कहता है। भगवान सबको एक बार मौका देता है। उसी का जो सही सदुपयोग कर लिया वह तो तृप्त हो जाता है, जो नहीं समझ पाया वह हाथ मलता रह जाता है। मैं ये नहीं कहता भाई कि मैं उन सदुपयोगी महान लोगों में हूं और तुम चूक गये। मैं भी तो तुम्हारी ही श्रेणी में तुमसे पीछे की लाईन में खड़ा हूं। आखिर क्या करें दिल-विल का मामला ही एेसा है कि हर जगह उडऩे लगता है लेकिन मोर्चे पर चढ़ते ही दिमाग ससूरा दिल को पीछे धकेल स्वयं आगे निकल जाता है। आज इतना जरुर आश्वस्त करता हूं कि एेसे जगहों पर अब मैं तुम लोगों को मौका दूंगा। स्वयं आतुरता नहीं दिखाऊंगा। सिर्फ तुमलोग नाकों में प्रवेश किये सुगंध , आंखों में भरे हुए सुंदर दूष्य का जो हिस्सा बाहर निकालोगे उसी सुगंध व दृष्य लीला सुनकर मन को शंात करने का प्रयास करुंगा।
(इतना कहते हुए अजय की आंखे भर आती है और वह भावविह्वल हो उठता है। आंखें बंद करके पुराने ख्याालातों को सोचते हुए झलमलाने लगता है। मन ही मन कहता है। हे भगवन दिमाग आखिर बनाए ही क्यों, सिर्फ दिल से ही काम चला देते तो अच्छा रहता।)
अजय के आंसू को देख सभी की हंसी-ठिठोली गायब हो गयी। विमलेश को तो काठ मार दिया, क्योंकि उसकी चर्चा तो पहले उसी ने शुरु किया था। दोनो उसको गले लगा लिए और समझाने लगे।
विमलेश :- अरे! यार दिल को इतना तोड़ देना मर्दानगी नहीं, यह तो लड़कियों के लक्षण हैं। मर्द तो बार-बार टूटता रहता है, फिर भी टूटन को जोडक़र जुटने का प्रयास जारी रखता है और अपने कामों में जुट जाता है। तुममें ये गिड़गिड़ाने और इतना विह्वल होने की आदत कहां से आ गयी। हमलोग भी कोई तीर तो मार नहीं दिए जिसे देख तुम वन वे रास्ता अपनाने लगे। हम भी तो तुम्हारी ही श्रेणी में हैं, फिर इन रढुंआें के बीच में रढु़आं प्रेमिका विरह में रोए इसका अर्थ नहीं निकलता। देख रहे हो सूरज यह बिल्कूल दिल का कमजोर निकला। यदि यही स्थिति रही तब तो काम हो चुका। जबकि मैदान में तुम सबसे आगे रहते हो लेकिन यहां उस पर पर्दा डाल संत बन गये। आखिर किसी बात को सोचकर तडफ़ड़ाहट में मरने से क्या फायदा। सिर्फ अपनी सांप-छछुंदर वाली चाल छोड़ दो तो और सब ठीक ही है। सिर्फ यही है कि तुम चूहा समझकर तो झपट्टा मारते हो लेकिन छछुन्दर समझकर छोडक़र चले आते हो।
सूरज :- यही तो बात है यार। यह छछुन्दर को छछुन्दर समझे तब तो ठीक ही है। यह तो वास्तव में चुहे को चुहा समझते हुए भी वहां पहुंचते ही सात्विक भाव में आ जाता है अथवा डर जाता है और उस शिकार को वहीं छोडक़र चला आता है।
अजय :- ( आंखों पर हाथ फेरते हुए गंभीर मुद्रा में कुछ जोश भरे हुए।) अच्छा भाई। इस समय पूरे अवगुण मुझमें ही आ गये हैं और तुमलोग अच्छे शिकारी बन चुके हो। तुमलोगों की वाणी तो एेसी ही है कि कहीं भी जाते हो तो बिना शिकार वापस नहीं आते लेकिन आज तक मैं एक भी शिकार करते नहीं देखा। जैसे सबलोग फूलों के सुगंध से वंचित हैं वैसे मैं भी हूं। फिर हममें तुममें अंतर ही क्या है? किस बात का ताना हमें सुना रहे हो। हमसे कहने से पहले अपने दिल में तो झांक कर देखो।
सूरज :- तुम खामख्वाह गुस्से से लाल हुए जा रहे हो। ये तो आपस में एक चर्चा हो रही है भाई। आखिर हमलोग आपस में ये सब बातें नहीं करेंगे तो किससे करने जाएंगे। मजाक हो या सामान्य बात ये सब तो आपस में किया जाएगा। जहां तक गलतियों का सवाल है गलती तो हम सब हर वक्त करते रहते हैं। सबसे बड़ी गलती तो यही है कि परीक्षा सिर पर है और हम लड़कियों की गलियों में मानसिक रंगरेलियां मना रहे हैं। जहां एक-एक पल का महत्व हो वहां हम ऐसे बैठकर गप-शप कर रहे हैं। इससे बड़ी गलती क्या हो सकती है। आखिर एक दिन हमारे द्वारा संचित सुज्ञान ही हमारे काम आएगा, व्यर्थ की ये गुलाब वाटिका नहीं। वह सुख एक क्षणिक मात्र है, जिसे हम सभी जानते हैं। लेकिन इसे जानते हुए भी कि इसमें हमारी मौत है कीट-पतंगों की भांति उसी दीपक के ईर्द-गिर्द हम टहलते रहते हैं।
विमलेश :- हां भाई। हम सब सिर्फ उनको देखते और उनकी चर्चा करते रह जाते हैं। यदि वे उत्तीर्ण
और हम अनुत्तीर्ण हो गये तो सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। उस समय हम उनके हंसी के पात्र हो जाएंगे। उनकी नजरों में भी हम हमेशा के लिए गिर जाएंगे। फिर तो वे कहां आकाश में और हम कहां गर्त होंगे। इसीलिए इस समय हमें पढ़ाई की चर्चा करनी चाहिए। वरना इन्हीं चर्चाआें के कारण किताबों को लेकर बैठने पर अथवा सोने पर हर वक्त मन में सिर्फ वही लोग तैरती रहती हैं।
सूरज :- यार, आज रात में तो गजब हो गया था।
यह बात सुनकर अजय में खुशी झलक गयी। उसके रुहांसी सा बना चेहरा मुस्करा उठा और आगे जानने की उत्सुकता बढ़ गयी।
अजय :- क्या कोई साक्षात दर्शन हुआ या आगे की बात बनी। सीढ़ी के अंतिम पावदान पर पहुंच चुके कि अभी अद्घकुंभ तक ही रह गये। कुंभ का इंतजार ही करना पड़ेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वप्र में ही सबकुछ हो गया।
(अजय के चेहरे पर प्रसन्नता देख सूरज व विमलेश भी अंदर ही अंदर प्रसन्न हो गये। माहौल थोड़ा रंगीनी की तरफ बढ़ा, क्योंकि उसके रुहांसी चेहरे से पूरा माहौल फीका पड़ गया था।)
सूरज :- बहुत खुब क्या कही तूने। तुम तो जैसे त्रिकालदर्शी हो। किसी के मन की बातों को भी इतने अच्छे ढंग से पढ़ लेते हो। यह तो अच्छे-अच्छे ज्योतिषियों को भी मात देने वाली बात है। यार पढ़ाई छोड़ यदि तुम ज्योतिष केन्द्र ही बना लेते तो अच्छी कमाई हो जाती। तुम्हारे द्वारा व्यक्त की गयी पहली संभावनाएं तो नहीं लेकिन अंतिम बिल्कूल सत्य है।
आज रात भोर तक किताबों को सामने रख इन्हीं सबका मन-पुलाव बनाता रहा। एक झुरमुट हमारी सौतन बन गयी और चांद तो इनके ख्यालों में खोने के लिए मजबूर कर ही रहा था। क्या बताएं अब आगे की बात बताना बहुत कठिन है। इससे दिल बैठा जा रहा है। झोंको के साथ वह चांदनी रात दिल में टिस पैदा करता जा रहा था। इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ सो गया और रम्भा इसी बीच आ गयी।
अजय :- (आश्चर्य से)क्या सचमूच।
सूरज :- (दिल पर हाथ फेरते हुए।) नहीं, स्वप्र में। (वह ख्वाबों में खो जाता है। कुछ देर बाद आहें भरते हुए।) एेसा लगता है कि मैं जो स्वप्र में देख रहा था उसी में डुबा हुआ कुछ बड़-बड़ा भी रहा था, जिसे बगल में ही सोए हुए पिता जी ने सब सुन लिया। मैं तुमलोगों के आने से पहले पापा से क्या कहें, वे सुने या नहीं, इन्हीं सब गुत्थियों को सुलझा रहा था। आज तो मैं तुमलोगों के आने तक दिमागशुन्य ही बना रहा।
अजय :- ये बता तू सपनों में था या सपना तुझमें था। किताबों को सामने रखकर किसी दूसरे गलियारे में खोना तो बहुत गलत है। इससे तुम पापा को नहीं खुद अपने-आप को धोखा देने के साथ ही सरस्वती मां से भी छल कर रहे हो। सही मानों तो जवानी से पहले ही तुम जवानी से इससे बैर की बीज बोते जा रहे हो जो जवां होते-होते चुभने लगेगी। इस तरह पढऩे से यदि रिजल्ट अशोभनीय रहा तो तुम घर वालों की नजर में दिमाग शून्य घोषित हो जाआेगे। मैं यह नहीं समझता कि कहीं से दिमाग खींचने की कोशिश की जाए और वह आने में असमर्थता जाहिर कर दे। क्योंकि यदि व्यक्ति दिमाग को कहीं एकाग्रचित्त करने का प्रयास करे तो अवश्य ही वह वहां केद्रिंत हो जाएगा। तुम लोग हमको फटकार लगाते हो। मैं समझता हूं कि तुम लोगों से तो मैं बेहतर ही हूं। भले मैं कम पढ़ता हूं लेकिन जबतक पढ़ता हूं हसनैन गलियों में दिमाग को टहलने नहीं देता। यदि हम कमल का फूल तोडऩे का प्रयास करेंगे तो दलदल में तो जाना ही पड़ेगा। इसीलिए कहा गया है सुंदरता देखने की चीज होती है तोडऩे की नहीं। सिर्फ देखो कुछ देर महसूस करो फिर भूल जाआे। इसी में हम सबकी भलाई है।
विमलेश :- वाह-वाह क्या दर्शन है। यह तो जानना चाहिए कि दर्शन व वास्तविकता में अंतर होता है। ये तो सभी कह देते हैं कि जगत एक माया है लेकिन उस माया से कोई मुक्त नहीं हो पाया है। तुम ये दर्शन पहले अपने ऊपर तो लागू करके देख लो। सूरज ने अपनी व्यथा सुलझाने के लिए अपनी व्यथाकथा सुनाई और तुम इसे दर्शन पढ़ाने लगे। जब व्यक्ति घावों से तड़प रहा होता है तो उसे होम्योपैथ नहीं तुरंत मरहम पट्टी की जरूरत होती है।
देखो सूरज फिलहाल तुम्हें यह भूलने की कोशिश करनी चाहिए कि पिता जी ने सब कुछ सुन लिया, क्योंकि यदि वे इस तरह की बातें सुने होते तो प्यार भरी बातें नहीं फटकार भरी बातें करते। रही बात सपनों में उनके आने की उसके दोशी हम सभी हैं, क्योंकि दिन भर जब उनकी ही बातें होती रहेंगी तो किताबों के सपने तो आएंगे नहीं। हमें आज से संकल्प लेना चाहिए कि परीक्षा तक जब भी मिलेंगे उनकी बातें न कर किताबों की ही बातें करेंगे। उनको कभी ख्यालों में नहीं लाएंगें, क्योंकि हमारे लिए वे जहर की घूंट होती जा रही हैं। उनकी बातें करने पर ध्यान भी किताबों की तरफ न जाकर उनके रुप में खोने लगता है जो हमारे लिए खतरनाक बन जाता है। उनसे ध्यान विमुख करने का यही तरीका है कि उनकी कभी हम चर्चा ना करें।
अजय :- सही बात है। मेरा यह वादा रहा। आज से उनकी चर्चा बंद। परीक्षा तक उनकी बातें हम कभी नहीं करेंगे। गजब है हमारा मन यह जानते हुए भी कि इस समय वे मीठा जहर हैं उन्हीं के ख्यालों में खोया रहता है। आज से हम पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई की बात करेंगे।
सूरज :- लेकिन इस बात से मेरे समस्या का कुछ हल नहीं निकला। पिता जी के मन का थाह कैसे लिया जाए हमें विचार इस पर करना चहिए। आखिर उनके मन को टटोलकर उसका हल तो निकालना जरूरी है। आखिर मन में उलझी गुत्थी जब तक सुलझे नहीं तब तक उसे कैसे शांत किया जा सकता है। मैं भी तो उधर से ध्यान हटा रहा हूं, लेकिन यह कोई वस्तु तो है नहीं जो जहां पर रख दिया वहीं का होकर रह गया। यह तो चलायमान रहता है और जहां भी बैठता है उसे सुलझााने का ही प्रयास करता है। हम इसके लिए क्यो करें?
अजय :- फिर वही बात। आखिर वे कुछ विशेष सुने होते तो कुछ जरूर डांटते। कुछ न डांटने का मतलब ही है कि उन्होंने कुछ सुना नहीं। आखिर तुम उस उलझन में ही क्यों पड़े हो। अनसुलझी बातों को ज्यादा सुलझाने का प्रयास करने पर उसके साथ ही अन्य कई बातें उलझा देती हैं। उस पर हमें विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए। आखिर यदि वे सुनें भी होंगे तो उसका यही तरीका है कि हम अपना परीक्षा परिणाम अच्छा दिखाएं और उनके मन को जीत लें।
सूरज :- ठीक है। आज से मैं भी मन के चोर को निकालने का प्रयास करुंगा। पहले तो अब घर में बैठकर पढऩे का प्रयास किया जाए। इससे प्रकृति के झरोंखों में मन न उड़ा करेगा।
इसी बीच अजय के पिता जी शंकर आ जाते हैं। उनका बिल्कूल जैसा नाम है काम से भी वे उसी तरह अवघड़ हैं और गुस्सा भी उनके नाक पर रहता है। गांजा खाना खाने से पहले व खाने के बाद तुरंत चलता है और दिन में हर घंटे चिलम चढ़ा रहना द्वार की इज्जत है। आंखे तो हर वक्त तरेरती ही रहती हैं। गाली तो उनके होठों पर सदा बैठी रहती है। उनको देखते ही सभी लोग मुंह छिपाने की कोशिश करने लगे। लेकिन वे सामने ही आ गये फिर एेसे में भगने की तो कोई जुगत दिख नहीं रही थी। अजय को तो बिल्कूल थरहा मार दिया था। उसको कुछ सुझ ही नहीं रहा था कि क्या बहाना बनाया जाए। सभी लोग किताबी चर्चा करने लगे।
इसी बीच शंकर की गर्जना हुई :- क्यों बे तू लोग यहां बैठकर तुमलोग क्या कर रहे हो? दिनभर सिर्फ गपशप करते रहते हो। पढ़ाई से तुमलोगों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रह गया है। इससे बढिय़ा तो चल कर कुछ खेती-बाड़ी का ही काम देखते तो बहुत कुछ बच जाता। तुम लोगों के लक्षण तो ठीक नहीं दिखते, हम तो उस जमाने में नवीं तक पास हो गये लेकिन तुमलोगों के लक्षण बता रहे हैं कि दसवीं नकल से भी नहीं निकाल पाआेगे।
सूरज :- अभी तो अजय आया है चाचा। थोड़ी पढ़ाई की चर्चा चल रही थी। अब तो परीक्षा भी नजदीक आ गयी है। इसलिए थोड़ा रणनीति बना रहे थे। आखिर परीक्षा नजदीक आने पर क्रमबद्घ ढंग से पढ़ाई तो करनी ही होती है। अब रटने से तो कुछ होगा नहीं। अब तो समय है सभी लोग आपस में अपनी-अपनी जानकारी को बांटे और एक दूसरे द्वारा किए गये ज्ञानार्जन का लाभ उठाएं।
शंकर :- (मन में गुस्सा लेकिन मुख पर हंसी का भाव दर्शात हुए।) तुमलोग पढ़ाई की रणनीति बना रहे हो या घर वालों को मूर्ख बनाने की। तुमलोग कितना पढ़ते हो यह तो कुछ ही दिनों में पता चल जाएगा। अरे, यदि पढ़ाई हुई हो तो ज्ञान बांटना समझ में आता है, जहां ज्ञान ही न हो वहां ज्ञानार्जन कैसा। अजय के लिए एक गाय तो पहले से ही खरीद रखा हूं। परिणाम आने पर दो गाय और आ जाएंगी। फेल होने पर तो इनकी आगे की पढ़ाई हो चुकी। शिव पूजन भईया से भी कहे देता हूं दो भैंस रख लें। इससे दुध बेंचकर कुछ पैसा आ जाएगा। पढ़ाई कितनी कर रहे हो यह तो जग-जाहिर है।
सूरज :- और हमलोग पास हो गये तो क्या विशेष उपहार देंगे। इसकी व्यवस्था किए हैं।
शंकर :- (हंसते हुए) पास होने का सवाल ही कहां है। वहां कोई तुक्का भिड़ाना तो है नहीं। वह परीक्षा है और पर इच्छा यहां बैठकर रणनीति बनाने से नहीं दी जा सकती। परीक्षा में बैठने से पूर्व जिसको कुछ भी जानकारी ही न हो वह नकल के भरोसे कितना काम कर सकता है, आखिर नकल के लिए भी तो इतनी जानकारी रहनी चाहिए कि कौन सा प्रश्न किस पेज पर है। हां यदि पास हो गये तो हमारी तरफ से एक घड़ी मिल जाएगी, जो तुमलोगों को समय याद दिलाने के लिए होगी।
सूरज :- बस घड़ी। फेल होने पर दो गाय और पास होने पर एक घड़ी। कम से कम दो गायों का ना सही एक गाय भर तो उपहार मिलना ही चाहिए।
शंकर :- घड़ी से ज्यादा क्या चाहिए? पास हो जाएंगे तो इनके ही तो काम आएंगे। उसमें मुझेतो हिस्सेदारी मिलनी नहीं है। सिर्फ मेरे पुत्र होने के कारण थोड़ी खुशी भर हो जाएगी।
सूरज :- अरे चाचा अभी तो हमारी खुशी आपकी खुशी है। हमारी तो इज्जत आपके ऊपर ही निर्भर है। हमारा अभी है ही क्या? यदि हम बढिय़ा अंक भी पाते हैं तो यही होगा कि फंला का लडक़ा बढिय़ा नबंर से उत्तीर्ण हुआ है। इससे हमसे ज्यादा तो आपकी इज्जत बढ़ेगी। हमारी औकात ही क्या है। हम तो सबकुछ आप लोगों के ऊपर निर्भर हैं, चाहे इज्जत हो अथवा अन्य निर्भरता।
शंकर :- हां आजकल तुम्हें बहुत लंबी-चौड़ी बातें आने लगी है। हम अपनी इज्जत के चलते ही एक घड़ी दे रहे है। सिर्फ इज्जत के शिवाय और क्या मिलना है। हम तो भगवान की दया से अब इतना कमा चुके हैं कि अपनी जिंद्गी का गुजर-बसर कर सकें। अब तो बस जो करना था कर चुके। अब ये अपना देखें, हमारी जिंद्गी का क्या है, अब तो हम अध-पके आम की तरह हो गये हैं बस इंतजार है पककर कब टपक जाएं या कोई आंधी आकर पकने से पहले ही कभी भी गिरा सकती है। अब तुमलोग अपना देखो हमलोंगो का क्या?
सूरज अब आगे कुछ नहीं बोल सका। सिर्फ मांफी मांग कर रह गया। उसका मुंह रुहासा जैसा बन गया। क्योंकि उसको अपने से ज्यादा बड़े लोग से बोलने का पछतावा होने लगा। वह सोचने लगा कि मैं भी फालतू का अजय के पापा से उलझ गया। हमें इस तरह की मुंहलगी नहीं करनी चाहिए। इसका परिणाम घर जाने पर संभवत: अजय को भूगतना पड़े। अब अजय मन ही मन मुझका गाली देगा, क्योंकि अजय के पापा की गुस्सैल प्रवृत्ति को सभी जानते थे। वे सूरज को भी कई बार पीट चुके थे। आज तो वह सुबह पता नहीं किस भले आदमी का मुंह देखा था कि इतना ढिठाई से बोलने के बाद भी उनके थप्पड़ का स्वाद लेने से रह गया। उसमें इतना बोलने की हिम्मत इस कारण हो गयी कि वे उसे गुदराते-पुचकारते भी रहते थे और वे उसे मुंह-लग्गु बना दिये थे। आज सबके मन में यह डर समा गया कि इसका खामियाजा अजय को भूगतना पड़ेगा। अजय झट से घर चला गया और किताब खोलकर बैठ गया। तब तक पीछे से शिव गुस्से में मुंह लाल किये हुए आ धमके
और बोले :- का रे, तू उन लोगों के साथ क्या गप हांक रहे थे। तुम्हारी बुद्घि बिल्कूल ध्वस्त हो चुकी है। तुमको मैं कितनी बार मना किया कि वहां जाकर बैठकी न लगाया कर फिर भी तू आदत से बाज नहीं आता। तुमको तो चस्का लग गया है लवन्डियाही की बात करने की एेसे में तुम कैसे मानोगे और शिव पूजन का पूत तो इस समय ज्यादा बोलने लगा है। एेसा ललागत है कि षि पूजन के भीबाप हो गईल है।
अजय :- ना पापा, मैं वहां बैठने नहीं बल्कि एक अनसुलझे सवाल को सूरज के साथ बैठकर सुलझाने गया था। उसका सूत्र वह जानता था। इस कारण मैं जाकर उसी को समझ रहा था।
शंकर :- हूं, हरामी दो दिन का छोकरा, तू मेरा भी बाप निकला। हम ही हो पढ़ाने चल दिया। ये नहीं जानता कि तू जो कर रहा है मैं ये सब करके छोड़ चुका हूं। ये दाढ़ी बाल इसी तरह नहीं पके हैं। यही सब करने के कारण आज यहां तुम्हारे जैसे नालायक को समझाना पड़ रहा है। वरना हम भी मंगलवा की तरह कहीं का अधिकारी रहते और ए$सी$ ऑफिस में बैठकर मजा लेते लेकिन नसीब में तो गोबर लिखा था फिर कैसे यह संभव था। देखो वो सुरेश लाला का खाने भर भी पैसा नहीं था उसके पास लेकिन दूसरों के घर खाकर और दूसरों के लालटेन से पढक़र गार्ड हो गया और आज लाल-हरी झंडी दिखाता हुआ पूरा देश घूम आता है। एक तुम हो जो कुछ सीखने का नाम ही नहीं लेते। (गहरी सांस लेते हुए) तुम भी अपने बाप के कदमों पर पैर रख चुके हो। इसका खामियाजा तुम्हें भी भूगतना होगा।
यहां मैं गाय-भैंस को नाद-चरन लगावत हैं और तुम, तुम वहां बैठकर गप हांक रहे हो। कह रहे हो कि सवाल पुछने गया था। कुछ खेत-वेत की चिंता नहीं है। कम से कम तुम इन्हें नाद-चरन लगा दिए होते तो मैं खेत ही घूम आता। आज करियावा सांड एक बिस्वा चना चर गया। खाने के लिए तुमको सबसे पहले चाहिए। इसकी फिक्र नहीं है कि इसकी जुगत कैसे करें? जब होगा ही नहीं तो खाआेगे क्या?
अजय :- मैं गप नहीं$.$.$.$.$.$.$.$.$।
अभी पूरी आवाज मुख से निकल नहीं पायी थी कि शिव के हाथ उसके गालों को लाल कर दिये। अजय तमतमा उठा। कंठ रुध गया, आंखों से झरना फूट पड़ा। मन की बात मन में ही दबा रह गया। चाहकर भी उसके कंठ बोलने में सक्षम नहीं रह सके। वह रोते हुए धीरे से खिसक गया। घर जाकर उसके आंखों से घंटों मोतियों से आंसू बहते रहे। उसके रोने का कारण ज्यादा चोट नहीं, बल्कि पापा के ऊपर क्रोध था जिसका जबाब देने अक्षम होने के कारण आंसू के रुप में फूट पड़े। वह अपने व सूरज के पापा की तुलना कर और आंसू बहाए जा रहा था। सोच रहा था कि वे कहां हर बात को समझाते हैं प्यार से और एक हैं जो हर वक्त दुत्कारते हैं। काश मैं उन्हीं के घर का रहता फिर कितना अच्छा होता। एक शिक्षित घर में पैदा होने के कितने फायदे होते हैं। इसका आज वह अनुभव कर रहा था।
इस वक्त वह आग-बबूला था। उसे देखने मात्र से एेसा लग रहा था कि उसके हाथ में कोई अस्त्र होता तो उसका प्रयोग करने में नहीं चूकता, लेकिन लाचार था। अब सिर्फ यह सोचने में लगा था कि कब हम इतना बलशाली होंगे कि पापा की हिम्मत मेरे ऊपर हाथ उठाने की न हो सके।
आखिर उसके मन में भी इस तरह का विचार आना उसकी गलती नहीं थी। यह उसने अपने परिवार से सीख रखा था। उसके बाबा और पापा भी तो अक्सर हर स्तर तक पहुंचने को उतारु हो जाते हैं। यहां तक कि दोनो को आमने-सामने गांजा पीने में भी कोई परहेज नहीं होता। एेसे में ऐसी भावना आ जाना उसकी गलती तो कही नहीं जा सकती। यहां तो सभी एक अपने बड़ों को देखकर ही सीखते हैं।
ऊधर अजय के पापा के जाने के बाद थोड़ी देर तक तो सूरज विमलेश भी इधर-उधर खिसक गये थे। लेकिन अजय के ऊपर कपडऩे वाली संभावित विपत्ति से सभी चिंतित थे। थोड़ी देर बाद ही दोनो हांफते-कांपते हुए इकट्ठा हो गये। उन्हें यह नहीं सूझ रहा था कि आगे क्या किया जाए। इस विपत्ति काल से कैसे उसे छुटकारा दिलाया जाए। कहीं वह ज्यादा डांट खाने पर मौत जैसी भयावहता पर विचार न करने लगे। नहीं तो पूरा दोषारोपण हम ही लोगों पर जाएगा। क्योंकि वह पहले भी एेसे विचार मन में कई बार ला चुका था। माथापच्ची करने के बावजूद कोई रास्ता निकलता न दिख रहा था। इसका कारण बिल्ली के गले में कौन चूहा घंटी बांधे। उनसे उलझने का मतलब था खुद को मुश्किल में डाल देना। ध्यान को तोड़ते हुए सूरज बोला :- अरे, यार आज तो गजब हो गया। अजय के पापा बहुत गुस्से में थे। वे उसे अवश्य मारेंगे और यदि उस पर मार पड़ी तो वह हमलोगों पर ही भड़ास निकालेगा। इसका कैसे उपाय निकाला जाए।
विमलेश :- आखिरकार इसमें हम कर ही क्या सकते हैं। तुम तो बीच में बोलकर फोड़े पर नमक छिडक़ दिए। चुप रहने पर हो सकता था कुछ न बोलें। तुमको तो कहीं भी रहा नहीं जाता बड़ों के बीच में भी बड़-बड़ा देते हो। तुम्हारी यही आदत कई बार उसे मार खिलवा चुकी है। अब इस बार देखो उस पर क्या बितती है बेचारे पर।
डांट के बाद हमें डांटे इस पर न विचार कर पहले हमें इस पर विचार करना चाहिए कि डांट के बाद कोई अपशकुन न कर डाले। इस कारण उसे अकेले में छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
सूरज :- हां, यार अब तो मुझे भी पछतावा हो रहा है। अजय के पापा बहुत गुस्से में थे। वे उसे अवश्य मारेंगे लेकिन मार के बाद वह कोई कदम न उठाए। इसका तो तुरंत कदम उठाना चाहिए। उस समय हमें भी बोलना तो नहीं चाहिए था, लेकिन क्या करें अजय को डांटते हुए हमें नहीं देखा जा रहा था। इस कारण हम बार-बार उस हाट-टाक को सामान्य करने की कोशिश कर रहा था। मैं तो यह सोच रहा था कि उनके गुस्से को शांत कर दूं। आखिर वे भी तो हम ही से कभी-कभी हंस लेते हैं। आज उसी हंसी को उनके मुखड़े पर लाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बाद में हमें भी लगा कि हंसी में बखेड़ा हो गया। अब तो जो हुआ सो हुआ, हमें आगे के राह के बारे में सोचना पड़ेगा। कुछ ना कुछ उसके बचाव के उपाय तो करने ही पड़ेंगे।
विमलेश :- आखिर हम कांटों में रास्ता ही क्या ढुढें। चाहे जितना कोशिश करें कांट हमें भी तो गडऩा ही है। यदि हम उसके बचाव में कुछ कहते भी हैं तो उनका गुस्सा और बढ़ता ही जाएगा। इसमें मामला बिगडऩे का डर है। हां, कांटा से कांटा निकालने का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। हो सकता है उससे कुछ काम बन जाए। यदि सफलता हाथ ना लगे तो उससे पूर्णतया तो असफल तो नहीं हो सकते।
सूरज :- कौन सा रास्ता है, जिसे हमलोग अपना सकते हैं।
विमलेश :- यदि अजय के बाबा को सब कुछ थोड़ा मिर्च-मसाला लगाकर बताया जाए तो हो सकता है सूरज अपने पापा के कोप-भाजन से बच जाए। वे अजय को बहुत मानते भी हैं और अजय का मार खाना वे बर्दास्त नहीं करेंगे। इसके लिए तो वे कई बार लड़ाई पर भी उतारू हो गये हैं।
सूरज :- हां, यार नुक्सा तो बहुत अच्छा है, चलो उनके यहां चलते हैं। पूरी उम्मीद है कि उनको हमलोग अपनी तरफ मोड़ लेंगे। उनको तो इतना भडक़ा दिया जाएगा कि वे खुद लाठी लेकर उनसे भीड़़ जाएंगे। शंकर चाचा की तो एेसी की तैसी कर देंगे। वे भी समझ जाएंगे। हां दादा के यहां जाने से पहले वाम वगैरह हाथ में लगाना होगा, क्योंकि असलियत कहने के लिए तो 36 गुण ही काफी है, लेकिन झूठ बोलने के लिए 72 गुण का होना जरूरी है।
विमलेश :- इस पर तो विचार कर लो कि वहां चलकर हमें क्या कहना है? क्या जो सच है वही बता देंगे या कुछ जोड़-घटाना लगाएंगे।
सूरज :- सत्यता में ही कुछ मिर्च-मसाला लगाते हुए बताएंगे।
jari hai