neta ANNA KO SAMARPIT
मित्रों,
आज कांग्रेस ने कहा है कि युवराज कोई तोता नहीं जो हर वक्त मीडिया से मुखातीब हों। हम यह नहीं समझ पाये कि नेता क्या तोता से इतर भी कुछ होता है क्या? नेता तो सिर्फ एक वक्ता बनकर रह गया है। एेसा वक्ता जो काम कुछ ना करे सिर्फ भाषण दे। तोता का भी यही काम है रटी-रटायी बात दोहराते रहना। अलीगढ़ या किसी अन्य जगह जाकर क लावती के घर भोजन करना, रेखा पासी के घर जाना ये क्या तोता की तरह व्यवहार नहीं है। क्या राहुल जी ने फिर कभी मुड़ के देखा कि उनके घर की स्थिति क्या है? क्या उनके लिए कुछ भी सहयोग राशि की व्यवस्था की गयी? क्या केंद्र सरकार ने गरीबों के लिए कुछ इनकी यात्रा के बाद किया या इन्होंने उसे करने के लिए कहा? राहुल जी सिर्फ एक बात जानते हैं? जहां चुनाव नजदीक हो वहां जाकर अपनी सुरक्षा तोड़ लोगों के होड़ में हाथ मिला आना? बस जनता खुश? राहुल चुप? जब बिहार में चुनाव था तो इन्होंने मुम्बई जाकर बिहार के लोगों से हमदर्दी जताने के लिए हाथ मिलाया? क्या उसके बाद इन्होंने उन बिहार के लोगों की कभी हाल जानने की क८ोशिश की? वहां तो इन्हीं की मिली-जुली सरकार है। यदि देखा जाय तो कांग्रेस का वक्तव्य कुछ हद तक सही ही है। राहुल जी तोता नहीं, गौरैया हैं जो वक्तव्य नहीं अपनी फुदकती चाल से लोगों को फिदा करने का तरीका अपनाया है। गम्भीर मुद्दे पर चिंतन के बजाय अपने को अलग कर फिर शांत होने पर किसी दलित के यहां जा उसकी भरपायी करने की कला अपनायी है। आखिर गम्भीर जो है ही नहीं, वह गम्भीरता की बात कैसे कर सकता है?
मित्रों यह हाल सिर्फ कांग्रेस का नहीं। भाजपा व वामदल भी एेसे ही हैं। अब देखिए भाजपा में एक गम्भीर नेता माने जाने वाले पूर्वांचल के एक सीट से विजयी बड़े नेता ने अपने बजट को खर्च न करने पर तर्क दिया कि यह बजट ठेकेदार लूटने के चक्कर में पड़ जाते हैं। अब आप ही बतायें यदि वे लुटते हैं तो इमानदार नेता जी उसकी देखरेख नहीं कर सकते। क्या उस मुद्दे पर जांच नहीं करा सकते। सिर्फ इसके लिए जनता का पैसा जनता के हीतों के लिए खर्च न किया जाय कि यह लूट जाएगा। क्या वह पैसा उनके घर का है। उनको मोह तो एेसे ही है जैसे वे अपना पैसा दे रहे हों। भाजपा में एक महिला नेता भी हैं जो गौरया की तरह फुदकती तो हैं, लेकिन सीमित दायरे तक।
वाम मोर्चे की क्या बात करें। जनता ने खुद बात कर लिया है। वहां सिर्फ और सिर्फ बात होती है। वाम आज अपने विचार से ही विमुख हो चुका है।
आज सभी मिल सिर्फ इसीलिए अन्ना का विरोध बाहर या भीतर से कर रहे हैं कि मौका नहीं मिलेगा फिर अरबों विदेशों में पैसा जमा करने का, मौका नहीं मिलेगा जन भावनााओं के साथ खेलने का।
लेकिन अब इन्हें पता चल रहा है। जनता जाग चुकी है। आवाज बुलंद हो रहे हैं। नया जेपी आ गया है। गाँधी रूप दिख रहा है। चहुंओर विरोध देख कांग्रेसी तो घरों में दुबक गये हैं। विपक्षी हाँ में हाँ का सूर मिलाने लगे हैं। इस फिराक में हैं कि कहीं यह मौका न निकल जाय। यदि एेसा नहीं होता तो भाजपा ने पहले ही अन्ना के लोकपाल का समर्थन क्यों नही किया।
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