-यमुना स्तुति
कोइ कोलाहल नहीं किसी से नहीं गिला सिकवा।
सिर्फ स्वच्छ जल लाती हो
गंदगी अपने में समेटते हुए
गंदी होती चली जाती हो
देश की राजधानी पहुंचते-पहुँचते
गंदे नाले के रुप में तब्दील हो जाती हो।
फिर भी कुछ नहीं कहती।
हर रोज तू कितना दुख सहती
फिर भी कुछ नहीं कहती
तेरे नाम पर लगा गये लोग करोड़ो की चुना
देश ही नहीं विदेशों से आए पैसे की भी हो गयी खपत।
फिर भी रत्ती भर नहीं हुआ सुधार।
अब फिर तेरे नाम पर लगे हैं लोग लेने के लिए उधार।
पूरे समाज की गंदगी समेटे हुए कितना हृदय से स्वच्छ हो तू।
काश इस शांत हृदय की शांति मुझे भी दे देती।
चारो तरफ से घिरा हूं मैं।
थोड़ा दुख सहन करने की क्षमता मुझे भी दे देती
तुझमें कितनी गंदगी आती है
फिर भी तू अपना समय उसकी सफाई में ही लगाती है।
इसी कारण तो दिल्ली में काली होने के बावजूद,
प्रयाग आते-आते नीली हो जाती है।
काश मेरी गंदगी भी तू ले लेती,
थोड़ा दुख सहन की क्षमता मुझे दे देती।