Tuesday, June 5, 2012

निराली है

दुनिया बड़ी निराली है







कोई खाते-खाते मरे






किसी का पेट खाली है।






दुनिया बड़ी निराली है।






फैल रहा प्रदुषण चारो तरफ






सरकार ले रही इसे दूर करने का हलफ






जो दूर करने का अधिकारी है






वही सबसे बड़ा शिकारी है






दूसरों को देता है शिक्षा






प्रदुषण दूर करने का






उसका घर खुद प्रदुषण की थाली है






दुनिया बड़ी निराली है।






वन कटवा रहा है वन रक्षक






पशुआें के लिए नियुक्त अधिकारी खुद






बन गया है उसका भक्षक






खुद चारो तरफ जल बहा रहा है






जल संरक्षक।






जो जहां पा रहा है






वो वहीं लुटे जा रहा है।






न्यायालय में गीता की कसम खा






झुठ की कथा गा रहा है।






यमुना पर हुआ लाखों खर्च






गंगा में भी करोड़ो डुबा रहा है।






खुद नदियों को अपने पाप से






प्रदुषित करता जा रहा है।






पैसे के लिए






खाली सबकी थाली है।






किसान मर रहा खेत में






व्यापारी का जेब भारी है।






पैदा करता है वह






व्यापारी किमत लगाने का अधिकारी है।






दुनिया बड़ी निराली है।






कोई खाते-खाते मरे






किसी का पेट खाली है।


माया

माया, माया, माया,



इससे मुक्ति कोई ना पाया।


बुद्ध कहते हमने पाया,


महावीर, तुलसी दिखाते अंतरछाया।


पर मैं कहता हूँ,


ये तो खुद ही हैं माया।


आखिर आप ही बताओ,


शब्द जाल, ईश्वर की आसक्ति


शरीर का बंधन, क्या यह सब नहीं है माया।


संकीर्ण विचारों के कारण ही

ये मानते हैं परिवार को माया।

मैंं कहता हूँ


जो भी यहाँ आया,
वह, कभी माया से मुक्त ना हो पाया।

आखिर अर्थ क्या है माया का,


गृहस्थ आश्रम है माया,


या पितृ ऋण से मुक्ति है माया।


इनको माया बताने वाले,


होते मृत्यु से भयभीत,


यही कहता हूँ,


मृत्यु से न हो भयभीत।


परिवार पोषण है तेरा कर्तव्य,


कुछ नहीं है माया, कुछ नहीं है माया।