Tuesday, June 5, 2012

माया

माया, माया, माया,



इससे मुक्ति कोई ना पाया।


बुद्ध कहते हमने पाया,


महावीर, तुलसी दिखाते अंतरछाया।


पर मैं कहता हूँ,


ये तो खुद ही हैं माया।


आखिर आप ही बताओ,


शब्द जाल, ईश्वर की आसक्ति


शरीर का बंधन, क्या यह सब नहीं है माया।


संकीर्ण विचारों के कारण ही

ये मानते हैं परिवार को माया।

मैंं कहता हूँ


जो भी यहाँ आया,
वह, कभी माया से मुक्त ना हो पाया।

आखिर अर्थ क्या है माया का,


गृहस्थ आश्रम है माया,


या पितृ ऋण से मुक्ति है माया।


इनको माया बताने वाले,


होते मृत्यु से भयभीत,


यही कहता हूँ,


मृत्यु से न हो भयभीत।


परिवार पोषण है तेरा कर्तव्य,


कुछ नहीं है माया, कुछ नहीं है माया।


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